Friday, 20 December 2013

प्रतिक्रिया

धरती के जिस टुकड़े पर
नहीं होता है
हमारी देवियों और भद्रपुरुषों का सम्मान,
तब ऐसी स्थिति में वहाँ
कुछ भी उचित नहीं है हमारे देश के लिए।

वह धरती का टुकड़ा
निरा अंध और सवेदनहीन जैसे नगरसेठ
जिसे मतलब है अपने से
अपने ही हित से ।
ऐसे में उस नगरसेठ से
मान-सम्मान की करना आशा
व्यर्थ हुआ करती है ।
उस से अपने स्वत्व की याचना करना
अपनी संस्कृति के खिलाफ जाती है ,
तब अपनी संस्कृति
चिल्ला-चिल्ला कर कहती है-
पुत्रों ! संगठित प्रतिक्रिया ही है इस का समाधान ।

प्रतिक्रिया से समझौता करना
उचित नहीं हुआ करता है
की गयी प्रतिक्रिया को अनदेखा करना
उस से भी अधिक घातक हुआ करता है,
जैसे रूज़ग्रस्त तन
अपनी पीड़ा के विरोध में
कराह कर प्रतिक्रिया दर्ज करता है ,
कराह में उत्पन्न आर्तनाद स्वरूप प्रतिक्रिया को
अनदेखा करना मृत्यु को
मुक्त निमंत्रण देना होता है ।

प्रतिक्रिया सिहासन से वीथी-वीथी तक होगी
तभी नगरसेठ सा
वह भ्रमित अहंकारी अमरीका समझेगा
किसी देश की संस्कृति का शुचि विधान ।
नहीं हुई ठोस प्रतिक्रिया तब
फिर-फिर कर होगी पुनरावृत्ति ,
अपमानों की काली शृंखला की ।

क्या तुम मरे हुए से हो ?
यदि नहीं तो उचित समय पर
उचित प्रतिक्रिया दर्ज करना भी तो है राष्ट्रीयता ।

स्वस्थ देश के स्वस्थ विकास के लिए
प्रतिक्रिया है अत्यावश्यक सी
यह प्रतिक्रिया ही हमें लौटाती है –
हमारा स्वत्व और सम्मान ।
कविता तुम चुप मत होना ,
तुम्हें तो हर कोई सुनता है ,
वह अपमानित जन हो
या नगरसेठ या अमरीका । 

Wednesday, 27 November 2013

संधान

लिजलिजी भावनाओं से
पैर पूरी तरह 
जम गए हैं
जैसे–जैसे हिलता है
उतर जाता 
बहुत गहरे
जैसे किसी 
सूनी जगह के
भयानक दलदल में
उतरता चला जाता
कोई 
निरीह चोपाया।

भावनाओं के इस 
लिजलिजे खेल में
जो भी उतरा
कभी नहीं जीता
वह छला गया
जैसे छला जाता है
वेणुवादन के
मधुर नाद में
कोई निरीह कुरंग
जिसकी प्रतीक्षा
कर रहा संधान ।

त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमंद (राज॰)
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Tuesday, 8 October 2013

कुछ नया होने को है

मुर्दनी माहोल में
सरगोशियां होने लगे
जब धुंआ यकायक भर उठे
तब मान लेना
कुछ नया होने को है।

नित नए संत्रास से
वातावरण गर्माने लगे
जब धरा रह-रह जल उठे
तब जान लेना
कुछ यहाँ होने को है।

जिंदगी की हाट में
श्वांस महँगी होने लगे
जब मुट्ठियाँ कसने लगे
तब देख लेना
कुछ उलट होने को है।

मृत्तिका के सृजन से
सुर्ख सूरज तपने लगे
जब धरा पाटल सी लगे
तब कह लेना
उत्सर्ग ही होने को है।

कुछ नए की चाह में
सब हव्य ही होने लगे
जब हवन खुद होने लगे
तब सीख लेना
व्यर्थ सब जलने को है।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द। 

Saturday, 21 September 2013

सच पूछो तो बात अलग है।।

कोरे कागज़  
काली स्याही जब शब्दों से 
खरी बात कह आग लगाती   
सच पूछो तो
बात अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।। 

पुष्पित उपवन  ,
अपने माथे अंगारों से  
पुष्प सजा विद्रोह दिखाता 
शपथ से कहता
आग अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।। 

जब हंसों ने
मुक्ताओं का मोह छोड़ के 
पाषाणों को राग सुनाया 
ज़रा कान दो
राग अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।। 

अलमस्तों ने
प्राण हथेली पल में रख कर 
प्राणों को निज देश पे वारा 
सुर्ख धरा का
भाव अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।।  

शव सा रह के 
कब तक शोणित व्यर्थ करेगा
ज़रा कपोलों पर शोणित मल
दीवानों का
फाग अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।। 

इतिहासों ने
उसे सहेजा जो लीक छोड़ के   
आँख मिलाने  चला काल से 
यह जीवन का 
भाग अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।।  

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द ( राजस्थान ) 

Sunday, 15 September 2013

राम तेरे वंदन से , बैठा रहा कौन यहाँ ,
मैं भी गति पा कर के , गढ़ चढ़ जाउंगा.
राम नाम गान सुन , आसन जमाती रमा ,
राम गान बल पर , अर्थ गह जाउंगा.
क्षण-क्षण अघ चढ़ , भार चढ़े जाता यहाँ ,
राम की कृपा से अब , पुण्य-पथ जाउंगा.
नाम मात्र लेने से ही , वैखरी मचल उठे ,
रसहीन हो कर भी , काव्य रच जाउंगा.

प्रभु राम विनती है , सुनिये विनय मम ,
प्रभु के भरोसे मैंने , आज भंग खाई जो.
सुधि जन वृन्द मध्य , बैठे कई कवि-वर,
सब मध्य रचनी जो , राम कविताई जो.
राम कथ्य विविध है , विविध चरित्र वहां,
रस के रसाल सम , छंद मनोहारी जो.
मांगता त्रिलोकी अब , दया कर दीजिए ,
सुन्दर कविता रूप , रस में रचाई जो.

राम का मधुर रूप ,सीता सह शोभता हैं,
गजानन आकर के , दर्शन कराइए .
आसन विराज कर , गणपति महाराज,
रिद्धि-सिद्धि-बुद्धि सह , काव्य को रचाइए .
भगवती भारती भी , अब शीघ्र आ कर के ,
राम-काव्य रचन में , स्वर भर जाइए .
राम कथा पारावार , जननी पीयूष सम ,
बालक अबोध तव , पीयूष पिलाइए.

नित्य रत रहते हैं , सरस सृजन हेतु ,
सरस सृजन हेतु , जगत प्रमाण है.
जगत उदार हेतु , दिव्य-काव्य रच दिए ,
दिव्य काव्य-दर्शन में , वेद ही प्रमाण है.
सृजन के मार्ग हेतु , ऋत सत्य साथ कर ,
सृष्टि का सृजन किया , भारती प्रमाण है.
कविवर प्रजापति , बार-बार वंदन है,
प्रतिनिधि मात्र बनूँ , रचना प्रमाण है .

ममता की निधि आप , मां भवानी भगवती ,
बुद्धि का प्रवाह रहे , ऐसा वर दीजिए .
बुद्धि सह श्रद्धा रहे , श्रद्धा सह शक्ति रहे ,
शक्ति में विनय रहे , ऐसा वर दीजिए.
राम गुण गान रहे , लोक का निर्माण रहे,
रावण विध्वंस रहे , ऐसा वर दीजिए.
राम का विरुद रहे , वर्तमान साथ रहे ,
लेखनी प्रबल रहे , ऐसा वर दीजिए .

ऊँचे नग वास करे , डमरू निनाद करे ,
भस्म अंगराग करे ,वैराग्य के धाम हैं.
मृग चर्म वेष करे , नाग कंठ हार करे,
बिल्व अनुराग करे , मंगल के धाम हैं.
देव शिव गान करे , नर शिव जाप करे,
सर्वत्र संहार करे , कलाओं के धाम हैं.
भवानी को साथ करे , अगुण-सगुण करे,
भोलेनाथ कृपा करें , आनंद के धाम हैं.


- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.
भाग्य के भरोसे कभी , कर्मशील नहीं रहे ,
                       पतवार लिए हाथ , लड़ लेते धार से .
धूम्र देख होते खड़े , ज्वाल की तरफ बढे ,
                       चिंता नहीं कौन साथ , खेल जाते आग से.
भाग्य के भरोसे बैठ , गाते गीत भाग्य के हैं ,
                       काल के बंधन बंध , मारे जाते काल से .
कर्मवीर जगत में , नभ के सितारे से हैं ,
                       धरा उन की रही है , वे हुए प्रताप से.

जो निठल्ले ही रहे हैं , खाते रहे सोते रहे ,
                       दिवस को व्यर्थ किया , व्यर्थ के प्रलाप से .
वे निठल्ले चीखते हैं , दस दोष देखते हैं ,
                       देश को वे हीन कहे , व्यर्थ के विलाप में .
कर्मवीर सदा चले , नहीं देखे धूप-छाँव ,
                       सृजन को देखते हैं , देश के विकास में .
देश पे विपत देख , कर्मवीर वरवीर ,
                       असि धार दौड़ पड़े , सिंह से प्रताप से.

दौड़-दौड़ अरि कहें , आ गये प्रताप यहाँ ,
                       मार रहे काट रहे , हम को बचाइए .
झुण्ड-रूप दे कर के  , भेज दिए राणा ओर ,
                       जोड़ हाथ कहे झुण्ड  , हमें न कटाइए .
रुदन में अरि कहे , हाय अल्ला कहाँ फंसे ,
                       मेवाड़ के चंगुल से , हम को निकालिए .
कहाँ छिप गये यहाँ , अकबर मानसिंह ,
                       रूद्र सा प्रताप दिखे , कोई तो बचाइए .

मेवाड़ की ललनाएं , सजन से कह रही ,
                       देशहित भीड़ जाओ , अकबरी दल से .
हल्दी सम हल्दी घाटी , रक्त में नहाई हुई ,
                       लाल-पीली हो रही है , अकबरी दल से .
प्रिय घर लौटें तभी  , अरि की विदाई हो ,
                       लड़-लड़ मर जाना , अकबरी दल से .
प्रताप मेवाड़ सा है , मेवाड़ प्रताप सा है ,
                       दो-दो हाथ कर आओ , अकबरी दल से .

देख-देख तुरंग को , रण ही ठिठक गया ,
                       हय है ये हय सा या , विद्युत का मोद है .
इस क्षण यहाँ रहा , उस क्षण वहां रहा ,
                       चंचल-चपल अश्व , शक्ति भरा श्रोत है .
अरि दल मध्य अश्व , भर-भर चौकड़ियाँ ,
                       अरि को छकाता चले , कौशल का कोष है ,
अश्व यह चेटक है , प्रताप हैं अश्वपति  ,
                       रण में ही मिले मानो , गति और शौर्य हैं.

त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द। 

Saturday, 14 September 2013

कबीर की तरह

चीख और चिल्लाहट में
राग बहुत बेसुरा है
फिर कहोगे -
मुझे किसी ने सुना नहीं ॰
लोग तुले हैं
अपनी जेबों को टटोलने में
और
घर के राशन-पानी की
सूची को पूरी करने में
वे बहुत व्यस्त हैं
संध्या के सूरज की तरह
अपनी अस्मिता के लिए ॰

तुम को अपनी
कविता की पड़ी है
जिस में किसी
अप्रतिम सौंदर्य की
देह यष्टि का
उस के रसीले होठों का
कटाक्ष मारती आँखों का
उभरते हुए अंगों का
जिक्र भर है
तुम्हारी आँखों का चश्मा
बहुत रंगीन लगता है ॰

तुम्हारा पूरा ध्यान
अपने शब्दों की
जादूगरी पर है
जिस के लिए
तुम ने रची है
यह मायावी रचना
"वह" किसी इन्द्रजाल से
मुक्त होने के लिए
छटपटा रहा है ,
कितना अच्छा होता
तेरी रचना का स्वर भी
इंद्रजाल को तोड़ने में
सार्थक होता
तब
संगत होती
स्वर होता
और
इंद्रजाल के विरुद्ध
दिल को छूने वाला
कबीर की तरह
संगत लिए गान होता॰

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमंद ( राज )

संवेदना तो मर गयी है

एक आंसू गिर गया था , एक घायल की तरह . तुम को दुखी होना नहीं , एक अपने की तरह . आँख का मेरा खटकना , पहले भी होता रहा . तेरा बदलना चुभ र...