Saturday, 6 September 2014

रिश्तों की बुनियाद

रिश्तों की बुनियाद
कंकरीट पर
खड़ी होती नहीं मिलती
जब भी देखा उसे
प्यार की गीली मिट्टी पर 
पली-बढ़ी खिलखिलाती मिली।
रिश्तों के आँचल में
पनपते हैं कई सपने
जिन्हें पूर्ण करने में
एक पूरा युग खप जाता,
फिर भी कह नहीं सकते
देखे गए सपने
यथार्थ में साकार होंगे।
सपनों को पूरा करने में
कितने ही जन
कतरा-कतरा हो कर
बिखर जाते,
लेकिन ,
उन लोगों को
नहीं होता आभास कि
उनके लिए
कोई कितनी बार है मरा-खपा।
रिश्तों से भी ज्यादा
है बहुत जरूरी
पहले उनको बचाना
जो रिश्तों के नाम
असमय ही काल के पास
खड़े हो कर
नर्म सपनों में खो जाते,
उनके ही नर्म सपनों की तह में
कहीं काल अंगड़ाई लेता
अनुभव होता
हाय ! यह अनुभूति बहुत भयावह
फिर भी जीवन के लिए
जद्दोजहद बहुत जरूरी ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

मौन की भाषा



मौन की भाषा का भी
अपना व्याकरण
होता ही होगा,
उसी व्याकरण के
आधार पर 
आँखें पढ़ लेती होंगी
मौन अभिव्यक्ति के संदेश ?
मैंने भेजें हें संदेश
मौन के बल पर
(भाव-भंगिमाओं के साथ भी )
लेकिन आजतक नहीं आया
उधर से कोई प्रत्युतर
शायद मौन की भाषा को
गढ़ने का भी होता होगा
कोई छंदानुशासन या विधान।
हँसता हूँ आज स्वयं पर
मैंने भी क्या खूब गढ़ी
मौन की भाषा
उम्र चुकती गयी
किसी अल्हड़ नदी की तरह
संदेश उधर से प्रत्युतर मेँ
लौट कर आया ही नहीं
जैसे बहा हुआ नदी का पानी
पलट कर उद्गम स्थल तक
नहीं आता कभी
अब मौन की भाषा
मेरे लिए तो
विचारणा का विषय हो गया।
कभी-कभी भोजपत्रों पर अंकित
शिकायत और प्रेमपत्र
मौन के गढ़े संदेशों की
हंसी उड़ाते अनुभव होते हैं,
कभी-कभी मौन मेँ
गढ़े संदेशे भी
इतिहास मेँ कुछ पृष्ठ
अपने नाम करते हैं
चलो मित्रों !
“कौन किस पर भारी”
इस बहस को विराम दे दें
लेकिन मिलकर
मौन के व्याकरण को
तय करते हैं
क्योंकि मुझ सहित
तमाम कवितावादियों की उम्र
मौन के आधार पर व्यर्थ जाती है
उधर से कोई संदेश जो नहीं आया।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज॰)

एक चिड़िया

मधुर ताने
छेड़ती है
भोर से ही
एक चिड़िया,
ज्यों संवेदना में 
गूढ बातें
कह रही है
एक चिड़िया ।
कल तलक तो
धूप गहरा
जुलसा रही
हरित दुर्वा,
पेड़ सारे
शिथिल होते
लताएँ मरी जाती
जो हरित पर्णा।
गर्म वातावरण मेँ
उचित गाती
एक चिड़िया ॥
कहाँ रुके हैं
नीलनभ के
खग समान
घनश्याम प्यारे,
कहाँ जा के
बस गए हैं
प्राण सम
जलद सारे।
संवेदना को
स्पष्ट करती
एक चिड़िया ।।
वह जानती है
पत्थरों पर भी
उग आती है
हरित पत्ती,
बह जाती है
मधुर धारा
दह रही हो
जब नर्म धरती।
तपस्विनी सी
बोध देती
एक चिड़िया ॥
गर्म वातावरण मेँ
उचित गाती
एक चिड़िया ॥
-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज.)

बसा लूँ आज तुम को

विश्राम का समय कहाँ
कुछ देर निहारूँ
खुला गगन खुली धरती
और इनमें अभिव्यक्त तुम को।
जानता हूँ बहुत कुछ है
हर दिशा में
जो इस समय अवांछित
शांत क्षण का एक अवसर
दर्शा रहा एक क्षण में मुक्त तुम को ।
पास में निधि बहुत थी
वह असमय ही खो गयी
फिर से जुट गयी
हाथ मेरे नेह की अक्षय निधि वो
लो समर्पित कर रहा हूँ भव्य तुम को।
कौन जाने कब कहाँ
कौन आए कौन जाए राह में
समय निर्मम दौड़ कर
सब की बहियाँ देखता
बात दिल की कह चलूँ आज तुम को।
अंगार पर बैठा हुआ
साधता हूँ साधना के पथ सभी
पंचाग्नि भी शर्मा रही साधना में
मर रहा या जी रहा पर चाहता
हर रोम में बसा लूँ आज तुम को ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

न्याय से पहले

नुकीली कील को लगता है
वह कहीं भी किसी के अंदर
धंस सकती है
और उसको अंदर ही अंदर
बेध सकती है, 
लेकिन कील को निकालने, काटने के साथ
कुंद करने के भी साधन
उन्होने ही बनाए हैं
जिनके वक्ष में धँसी थी कील।
जिन हाथों ने धकेली थी कील
नर्म वक्ष में
और हवा में इठलाते लगाए थे ठहाके
कुछ बदहवास से, कुछ विकृतचित्त से,
वे ही कील ठोकने वाले हाथ
नर्म और गुदगुदे पावों को
सहलाते देखे जाते हैं,
समय कभी क्षमा नहीं करता
किसी नयायाधीश की तरह।
समय देव है, समय पिता है
समय माँ है, समय ही मित्र है
समय ही हिस्से में बाँट कर देता है-
दुख और सुख,
जिसके हिस्से आए हैं दुख
उसे अब सुख मिलेगा
जिसके हिस्से आई थी
घनीभूत पीड़ा और अपमान
उसके हिस्से आएंगे शांति और सम्मान,
आखिरकार समय देता है
क्योंकि समय गधे की तरह
कभी व्यर्थ का बोझा नहीं ढोता।
शांति, सम्मान और अधिकार
स्वतः नहीं आते हैं
मांगने पड़ते हैं, कुछ लड़ना होता है
समय भी तभी सुनता है
जब हम उठा देते हैं
योद्धा की तरह शंखनाद,
समय बहरा नहीं है
समय रहता है सत्य के साथ
इसीलिए वह न्याय से पहले
लेता है कुछ वक्त,
वह देखना चाहता है कील ठोकने वाले
हाथों का विश्वास,
वे गंदे हाथ कब तक ठोक सकते हैं
नर्म वक्ष में सड़ी कीलें।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

वे निश्चित भ्रम में जिये

जिनको भ्रम में जीना है
वे निश्चित भ्रम में जिये
भ्रम उनके लिए हवा पानी
और भोजन सा
बहुत ही आवश्यक 
वे भ्रम में चलते हैं
वे भ्रम में बढ़ते हैं
वे भ्रम में सोते हैं
वे भ्रम में ही
सारी चर्या करते हैं
बस, भ्रम में नहीं जागते
उनके पीछे विलाप
व्यर्थ करना होता है
वे भ्रम में नहीं जागते
वे भ्रम में मारे जाते।
कुछ भी बोलो
भ्रम का भी अपना साम्राज्य
भ्रम का भी अपना सुख
भ्रम में वे ही राजा
भ्रम में वे ही प्रजा
भ्रम में वे ही परमात्म
भ्रम में वे ही जीव
भ्रम में वे ही कारक
भ्रम में वे ही उद्धारक ।
जब समय का चक्र घूम-घूम कर
उनके पीछे थक जाता
भ्रम है कि नहीं छोड़ता पीछा
लंबी होती हुई छांव सा
समय झल्ला कर
खींच लेता अपने हाथ
इसीके साथ भ्रम में डूबे जन
डूब जाते गहन श्यामल तमस में
हो जाते हैं कैद
काजल सी काली कोठरियों में
जहां समय नहीं देता फिर कभी
संभलने का अवसर।
भ्रम जहर सा किसी डरावने काल के
प्रतिनिधि सा
किसी भयंकर अजगर सा
भ्रम में डूबे जन को
निगल जाने को आतुर..............................
मुझे खेद है -
कुछ लोग भ्रम से बाहर नहीं निकलते
क्योंकि वे भ्रम में नीतिनियंता
हम उनके भ्रम में पालक से
वे भ्रम में बहरे
वे भ्रम में अंधे
वे भ्रम में शून्य
नहीं अनुभव कर पाते
तरल समय को
जिसने भ्रम में भरमाए जन के
कर्मों से बहियाँ रंग दी ।
-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद॰ (राज॰)

विकल्प नहीं दिखता

पुस्तकें बिना हिले-डुले
बहुत कह जाती
उनकी बात सुनने के लिए
जरा उन्हें दिल के
करीब लेकर आना होता है 
पुस्तक के अंतर में
झाँकनी पड़ती है वो बातें
जिसे सलीके से
हमें चाहती है कहना
जैसे घर का बुजुर्ग
अपनी श्लथ काया के साथ
खटिया पर पसरा
मौन आँखों से
कहना चाहता है बहुत कुछ।
पुस्तकें बहुत सी स्मृतियाँ
ताजा कर देती है
उनमें उजागर होते रहते
रुई में लिपटे पड़े
वे रिश्ते
जिन्हें संवाद के समय भी
बहुत संभाल कर
उजागर किए जाते
कुछ वे रिश्ते
जिन पर हमारी आने वाली नस्ल
जिक्र करेगी
कुछ वे रिश्ते
जिन की छाप आपके अस्तित्व पर
इस तरह लग गयी
जिसे आप छुड़ाना
नहीं करते पसंद
जैसे, यह लाल पुस्तक
अब्बा की है
जिसमें लिखा है स्वजातीय गौरव
यह पीली पुस्तक
बहुत पवित्र
जिसने जिंदगी भर मेरे कान उमेठे
और आज मैं इस जगह
यह सुनहरी पुस्तक गौरी ने
गुलाब रख कर दी कॉलेज में
जिसमें आज भी दबे हैं
रंगीन काँच के टुकड़े से
जवानी के सपने।
अलमारी से झाँकती
ढेर सारी नई-पुरानी पुस्तकें
जिन पर देखी जा सकती हैं
असीम चिंताओं की रेखाएँ
जो सवाल उठाए हैं इन पुस्तकों ने
वे आज भी हल नहीं हुए हैं
उन्हीं सवालों में
उठा रही है एक सवाल
स्वयं के अस्तित्व का
हाँ, मैं भी बहुत चिंतित हूँ
पुस्तकों का विकल्प तो है
परंतु गुलाब और चिट्ठियों के साथ
बनने वाले नर्म रिश्तों का
विकल्प नहीं दिखता ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

संवेदना तो मर गयी है

एक आंसू गिर गया था , एक घायल की तरह . तुम को दुखी होना नहीं , एक अपने की तरह . आँख का मेरा खटकना , पहले भी होता रहा . तेरा बदलना चुभ र...