Thursday, 20 November 2014

अप्रासंगिक नहीं

दुनिया ने आदमी को
हाथी कहा....................
आदमी की काया
हो गई विशाल
वजन बढ़ गया 
वह दँतेला हो गया
उसकी कनपट्टियों से
बहने लगी मद की धार।
अब हाथी बना वह आदमी
सामने आने वाले को
अपनी विशाल काया से
निर्ममता से रौंदता चला जाता,
अपने विशाल दांतों से
हरे-भरे वृक्षों को
समूल उखाड़ फेंकता,
नहीं दिखाई देती
नर्म पौधों की फलटन।
त्रुटि की हुई अनुभूति
भरी दुपहरी
खोदना प्रारम्भ किया गया खड्डा
नर्म हथेलियों से
बंटी जाने लगी मूँज की रज्जु,
अस्मिता के लिए
उठाई जाने लगी  कुदाल
संगठन के लिए पकडे गए नर्म-नर्म तन्तु
रगड़ कर गर्म की गई हथेलियाँ
..........................................
आज भी ..........................................
यह सब अप्रासंगिक नहीं
आदमी को आदमी बनाए रखने के लिए ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद

Friday, 7 November 2014

अब तुम लौट आना

तमाम उम्र के गुजर जाने पर
तुम मिलोगे
जैसे थकी नदी से मिलता है
खारा समुद्र
नदी का मधुर जल भी
खार से मिल
म्लान होता है,
उस मिलन के लिए
बहुत चिंतित ।
तुम विशाल
आभा मण्डल भी
बहुत चमचमाता
जैसे चमकता सूरज,
परंतु दिनभर की
प्रखरता के बाद
सूरज धरा से मिलता
तब क्षितिज की ओर
मलिन होता चमचमाता सूरज
अंधेरे में गुम हो जाता है कहीं
यह भयावह लगता।
अधर तुम्हारे
नाम का जपन करते
पहले पपड़ाये
फिर फट गए
जैसे धरती दरक गयी,
हृदय अभी भी
नेह भाव से आर्द्र
जैसे बगीचे की क्यारी
नन्हें पौधों के लिए
उँड़ेले मीठे जल से तरबतर।
आँखें तुम्हारे
दर्शन के लिए आतुर
जैसे मरती फसल के लिए
मेघदर्शन को आतुर किसान,
साँसों का हाल ......
फड़फड़ाते विहग जैसे
मानो अब उड़े कि अब उड़े।
लौटते हुए पदचाप
सुनने को अतिव्यग्र दोनों कर्ण
जैसे पकी फसल की बालियों को
खेत की मुंडेर पर
चुगना चाहती गोरैया
अब तुम लोट आना।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज)

Wednesday, 5 November 2014

चिन्गारी की सीमा

चिन्गारी की सीमा
असीम
उसमें दीपक की
लौ
उसमें चूल्हे की 
अग्नि
उसमें अनुष्ठानों की
ज्वाला
उसमें क्रान्ति की
मशाल
उसमें वन की
दावाग्नि
उसमें सूरज की
सूक्ष्म ऊर्जा
उसमें प्राण, उसमें गति,
उसमें लय करने की क्षमता
लघु मानना
उपेक्षा करना
बहुत बड़ी है भूल,

चिन्गारी को जानें-समझें 
वह अनुभव होती, 
कभी वाणी से, कभी दृष्टि से 
कभी गहरे मोन के 
ठंडे सागर से,
वह आती-जाती
कहीं हमारे मध्य।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

आदमी और कपास

आदमी ने कपास को 
पूरी ताकत से 
मारी थी ठोकर 
और ज़ोर से बोला –
देख ली मेरी ताकत। 
कपास ने प्रत्युतर में
अपने को कपड़ा बनाया
आदमी को ढका
अब आदमी..................
कपास को छोड़ना नहीं चाहता
उसे डर है-
वह नंगा ना हो जाए। 


- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज)

जीवन तो दुर्वा का

जीवन तो दुर्वा का
वह जीती है प्रतिपल जीवन
धीरे-धीरे प्रसरण करती
दिशा-दिशा में
अपनी क्षीण झड़ें रोपकर 
धवल पताका लहराती।
देखा दुर्वा उखड़-उखड़
फिर-फिर उग आती
देखा दुर्वा रुँद-रुँद
फिर-फिर हरियाती
धूप, हवा, पानी आकाश और बर्फबारी
दुर्वा की जिजीविषा के आगे हारे।
कोमल नर्म सौंधी मिट्टी से जुड़
दुर्वा अपनी नन्ही पत्ती से
विजय पताका लहरा जग को कहती-
देखो मैं जीती हूँ,
अस्तित्व के लिए युग-युग से
धूप, हवा, पानी, आकाश और बर्फबारी
के खिलाफ लड़ती हूँ ।
मैंने जीना सीखा
नहीं जानती मैं मरना
इसीलिए जीवन की जद्दोजहद के लिए
लड़ती-मरती और फिर-फिर जीती
जीवन के प्रति निष्ठा मेरी यशगाथा ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

भरी-पूरी फसल

तुम्हारे हाथ से फेंका गया
रोटी का टुकड़ा
रोटी का टुकड़ा ही नहीं
वह भरी-पूरी फसल
जिसमें किसी का बहा है पसीना
लगी थी गाढ़ी कमाई का
मोटा हिस्सा।
उस फसल की बुवाई के साथ
बोये गए थे कुछ नर्म सपने,
कुछ आशाएँ
जो सालों से पूरी नहीं हुई,
फसल की गुड़ाई में
कुछ लोक-कल्याणकारी भावनाओं ने
कदम बढ़ाए थे।
तुम जरा इस रोटी के टुकड़े को
फसल के नजरिए से देख लेना,
तब हाथ रोटी के टुकड़े को फेंकने का
बेतुका निर्णय नहीं लेंगे। 

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज)

भ्रम में मारे जाते

जिनको भ्रम में जीना है
वे निश्चित भ्रम में जिये
भ्रम उनके लिए हवा पानी
और भोजन सा
बहुत ही आवश्यक 
वे भ्रम में चलते हैं
वे भ्रम में बढ़ते हैं
वे भ्रम में सोते हैं
वे भ्रम में ही
सारी चर्या करते हैं
बस, भ्रम में नहीं जागते
उनके पीछे विलाप
व्यर्थ करना होता है
वे भ्रम में नहीं जागते
वे भ्रम में मारे जाते।
कुछ भी बोलो
भ्रम का भी अपना साम्राज्य
भ्रम का भी अपना सुख
भ्रम में वे ही राजा
भ्रम में वे ही प्रजा
भ्रम में वे ही परमात्म
भ्रम में वे ही जीव
भ्रम में वे ही कारक
भ्रम में वे ही उद्धारक ।
जब समय का चक्र घूम-घूम कर
उनके पीछे थक जाता
भ्रम है कि नहीं छोड़ता पीछा
लंबी होती हुई छांव सा
समय झल्ला कर
खींच लेता अपने हाथ
इसीके साथ भ्रम में डूबे जन
डूब जाते गहन श्यामल तमस में
हो जाते हैं कैद
काजल सी काली कोठरियों में
जहां समय नहीं देता फिर कभी
संभलने का अवसर।
भ्रम जहर सा किसी डरावने काल के
प्रतिनिधि सा
किसी भयंकर अजगर सा
भ्रम में डूबे जन को
निगल जाने को आतुर..............................
मुझे खेद है -
कुछ लोग भ्रम से बाहर नहीं निकलते
क्योंकि वे भ्रम में नीतिनियंता
हम उनके भ्रम में पालक से
वे भ्रम में बहरे
वे भ्रम में अंधे
वे भ्रम में शून्य
नहीं अनुभव कर पाते
तरल समय को
जिसने भ्रम में भरमाए जन के
कर्मों से बहियाँ रंग दी ।
-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद॰ (राज॰)

संवेदना तो मर गयी है

एक आंसू गिर गया था , एक घायल की तरह . तुम को दुखी होना नहीं , एक अपने की तरह . आँख का मेरा खटकना , पहले भी होता रहा . तेरा बदलना चुभ र...