Monday, 12 August 2013

दो छोटी कविताएँ


(१)

जिसे कोमल मान कर ,
रोंद रहे हो ,
शायद तुम को अभिमान है ,
तुम हो बहुत कठोर ,
बहुत मजबूत ,
यह भ्रम है तुम्हारा ,
पानी से हमेशा ही ,
पत्थर कटे हैं ,
और
कटे भी तो ऐसे कटे ,
वे रेत हो गए।

(२)
पानी काटता ही नहीं ,
जोड़ता भी है ,
रेत की परत दर परत ,
जोड़-जोड़ कर ,
कितने ही द्वीप बना दिए ,
पानी कोमल जो है ,
अब तुम ही बताओ ,
स्त्रियों को ले कर ,
तुम्हारे विचारों पर ,
चढ़ा काला धुंआ ,
धीरे-धीरे ही सही ,
छंट रहा होगा।


-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द ( राज.)

Tuesday, 30 July 2013

जिज्ञासा

कहने को आँखे खुली है ,
पर ,
तुम ने देखा नहीं ,
नहीं करते प्रतिक्रिया ,
इस अजीबोगरीब ,
आचरण से ,
मितली आ रही है .

एक बात पूछूं ,
नाराज मत हॉना ,
बस ,
मेरी जिज्ञासा है ,
शमन करें ,
बहुत भला होगा ,
ऐसे हालातों में ,
ज़िंदा भी हैं ,
या ,
बिल्कुल मरे हुए .


-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द (राज.)

Sunday, 7 July 2013

बंद कमरों में .

बंद कमरों में कभी ,
तस्वीर बदली है ,
बदलना चाहते हो ,
वर्तमान की मुद्राओं को ,
ज़रा बाहर आ कर ,
पूरे दम के साथ ,
एक लम्बी ,
सांस भर कर देखो ,
हवा में कितनी नमी ,
कितनी गिर्दी या ,
कितनी गर्मी भरी हुई है ,
तब कहीं जाकर ,
तस्वीर बदलेगी .

ज़रा मिट्टी की ,
सुनना सिसकियाँ ,
जो बंद कमरों में ,
तुम्हारे ,
मानसिक विलास की ,
लिजलिजी दुर्गन्ध की ,
घुटन से फूट जाती हैं .
यही मिट्टी ,
जब भी मरती ,
कितने ही मानसिक विलासी ,
इस में क्षार होते हैं .

जब बंद कमरों में ,
बदलाव की बातें ,
करी जाती ,
जैसे अभी ही उत्सर्ग होगा
और ,
बंद कमरों की दीवारें ,
साक्ष्य बनकर प्रेरणा देगी ,
परन्तु ,
बंद कमरों में फूटे ,
असंतोष के स्वर ,
पुरस्कारों की होड़ में ,
कतारबद्ध देखे जाते ,
तब ,
क्षोभ से भर जाती हैं ,
छातियों से रिसती ,
पसीने की श्वेत धाराएं .
हाय ! ऐसा संघर्ष का ,
बौना रूप भी होगा ,
जिसे देख कर आँखें ,
धरती में गड़ी जाती .


त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द ( राज.) 

बहुत जद्दोजहद है

तुम्हारे लिए प्यार के 
मायने क्या हैं ?
मैं इस बहस में ,
कभी शामिल नहीं हूँ .
मेरे लिए प्यार ,
शाख पर लरजती हुई ,
कोमल पत्ती की तरह है ,
जो कि ,
शाख पर लग कर ,
खुद जीती है ,
और पेड़ में ,
प्राणों का संचार करती है .

प्यार कोई चिड़िया नहीं ,
नहीं वह कोई ,
खूबसूरत दस्तकारी .
प्यार कोई वस्तु नहीं ,
नहीं वह कोई ,
रसीली कलमकारी .
प्यार मधुर भावनाओं का ,
जीवंत स्पंदन ,
स्वयं चलता है ,
सुकोमल दिल के साथ ,
और,
कारवां जीवन का ,
हरदम साथ लिए चलता है . 

उलझ कर रह गया है ,
जीवन का अभिमन्यु ,
सत्ता के चक्रव्यूह में ,
फिर से दोहराया जाएगा ,
वही पौराणिक मिथक ,
जहां अंधों से दृष्टि वाले ,
अधिकारों को मांगेंगे ,
ऐसे में प्यार पर बहस ,
ठीक नहीं लगती .
ना जाने किस मोड़ पर ,
मैं प्यार को ,
साकार देखूंगा ,
अभी तो बहुत जद्दोजहद है ,
जीवन के समर में .


-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

Friday, 31 May 2013

प्रताप मेवाड़ सा है , मेवाड़ प्रताप सा है

भाग्य के भरोसे कभी , कर्मशील नहीं रहे ,
                       पतवार लिए हाथ , लड़ लेते धार से .
धूम्र देख होते खड़े , ज्वाल की तरफ बढे ,
                       चिंता नहीं कौन साथ , खेल जाते आग से.
भाग्य के भरोसे बैठ , गाते गीत भाग्य के हैं ,
                       काल के बंधन बंध , मारे जाते काल से .
कर्मवीर जगत में , नभ के सितारे से हैं ,
                       धरा उन की रही है , वे हुए प्रताप से.

जो निठल्ले ही रहे हैं , खाते रहे सोते रहे ,
                       दिवस को व्यर्थ किया , व्यर्थ के प्रलाप से .
वे निठल्ले चीखते हैं , दस दोष देखते हैं ,
                       देश को वे हीन कहे , व्यर्थ के विलाप में .
कर्मवीर सदा चले , नहीं देखे धूप-छाँव ,
                       सृजन को देखते हैं , देश के विकास में .
देश पे विपत देख , कर्मवीर वरवीर ,
                       असि धार दौड़ पड़े , सिंह से प्रताप से.

दौड़-दौड़ अरि कहें , आ गये प्रताप यहाँ ,
                       मार रहे काट रहे , हम को बचाइए .
झुण्ड-रूप दे कर के  , भेज दिए राणा ओर ,
                       जोड़ हाथ कहे झुण्ड  , हमें न कटाइए .
रुदन में अरि कहे , हाय अल्ला कहाँ फंसे ,
                       मेवाड़ के चंगुल से , हम को निकालिए .
कहाँ छिप गये यहाँ , अकबर मानसिंह ,
                       रूद्र सा प्रताप दिखे , कोई तो बचाइए .

मेवाड़ की ललनाएं , सजन से कह रही ,
                       देशहित भीड़ जाओ , अकबरी दल से .
हल्दी सम हल्दी घाटी , रक्त में नहाई हुई ,
                       लाल-पीली हो रही है , अकबरी दल से .
प्रिय घर लौटें तभी  , अरि की विदाई हो ,
                       लड़-लड़ मर जाना , अकबरी दल से .
प्रताप मेवाड़ सा है , मेवाड़ प्रताप सा है ,
                       दो-दो हाथ कर आओ , अकबरी दल से .

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

Monday, 27 May 2013

मृत्यु के नग्न उपासक

गूँज गये जंगल-शहर
बंदूकों की गरज में
और ,
उस दरमियान ,
सहमा तो केवल ,
मासूम आदमी .

हाँ , वह आदमी सहमा ,
जो रोज रोटी की,
जुगत में ,
ना जाने कितनी बार ,
जमीन में गड़ जाता है .
हाँ , वह आदमी सहमा ,
जो रोज अपनी लाज को ,
बचाने के चक्कर में ,
ना जाने कितनी बार ,
दुत्कारा जाता है ,
हाँ , वह आदमी सहमा ,
जो रातों की भयानक ,
सांय-सांय करती ,
काली वेला में ,
अपना सर छिपा लेने के ,
असफल प्रयासों में ,
ना जाने कितनी बार ,
धवल संस्थाओं से
नोच लिया जाता है .

गूँज गयी काली बंदूकें ,
भीषण गर्जन करती ,
लोकतंत्र में ,
साथ उसी के ,
छांट गयी ,
गर्म रक्त के फव्वारे ,
दृश्य बहुत निर्मम और विभत्स,
जैसे मरघट जाग गया हो ,
रक्त-मांस से सने हुए चिथड़े ,
इधर-उधर फैले-फैले ,
शव बिखरे हुए धरा पर ,
मानो कहते हैं ,
उन काले हत्यारे की ,
रक्तिम निर्मम ललकारों को .

जीवन का धवल पक्ष ,
हत्यारे नहीं जानते ,
शायद धवल रोशनी से ,
उनका परिचय कहाँ ?
जीवन के सन्देश संवाहक ,
हत्यारे नहीं जानते ,
शायद सन्देश संवाहक को ,
ले जाने वाले पथ से ,
शायद उनका परिचय हुआ कहाँ ?
जीवन की संस्कृति के सरगम को ,
हत्यारे नहीं जानते ,
शायद जीवन संस्कृति के सरगम को ,
हत्यारों की श्रुति ने सुना कहाँ ?
उनका परिचय केवल ,
बीहड़ और अंधियारे से है ,
काली-काली बंदूकों से है ,
हत्याओं और मरघट से हैं ,
वे मृत्यु के नग्न उपासक ,
जीवन का आराधन करना ,
हत्यारों की प्रवृत्ति का भाग नहीं है .

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

Saturday, 25 May 2013

गांधारी और धृतराष्ट्र से हो गये

कंधे से कंधा सट गया ,
परन्तु अभी तक ,
समझ में नहीं आया ,
आखिर कर ,
कौन क्या चाहता है ?

अब वे चिल्लाना बंद करें ,
तो कितना सुखद हो जाए ,
तनिक देर ,
कहीं बिना शोरगुल की ,
नम जगह बैठ कर
मैं परिस्थितियों को ,
ठीक-ठीक समझ सकूं .

न जाने क्यूं
कुछ लोग सर पर आकर ,
धमक जाते हैं ?
हाथ में झंडा लिए ,
बन बैठते हैं मसीहा,
शोरगुल हो-हल्ला ,
भीड़-भगदड़,
अखबारों के शीर्ष पर ,
छपती कुछ घटनाएँ ,
आकाशवाणी - दूरदर्शन पर .,
चीखती हुई ,
परावर्तन के सह कुछ बातें .

नयी-नयी बातों के ,
वजन में ,
कुचल जाती हैं ,
वे पुरानी बातें ,
जिन्हें जानना ,
जरूरी था .
शोर-गुल , भीड़-भक्का ,
आपाधापी और संशय में ,
गर्दी इतनी उड़ती है ,
साँसों को जबरन ,
घटकना भी दुष्कर है .

सभी के सभी उत्सुक ,
किसी नये
घटनाक्रम के लिए ,
जिस से कि ,
दिवस कुछ ,
रोचक तरीके से निकले ,
अब हम ,
आदी हो गए हैं ,
केवल घटनाएँ सुनने को,
सब के सब ,
गांधारी और धृतराष्ट्र से हो गये ,
जब कि बनना था ,
कृष्णार्जुन सभी को .

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द (राज.)

संवेदना तो मर गयी है

एक आंसू गिर गया था , एक घायल की तरह . तुम को दुखी होना नहीं , एक अपने की तरह . आँख का मेरा खटकना , पहले भी होता रहा . तेरा बदलना चुभ र...