Wednesday, 26 February 2014

अच्छे लगे

उलझे हुए रिश्ते भी अच्छे लगे जो तूने दिये।
रिसते हुए नासूर भी अच्छे लगे जो तूने दिये।


मलबे के दिये ढेर पर पसरे हुए रहते हैं हम ।
उझड़े वे आशिया भी अच्छे लगे जो तूने दिये।


आँख का काजल चेहरे पर फैलाये हुए बैठे ।
सूखे हुए आँसू भी अच्छे लगे जो तूने दिये।


भूख-गरीबी और फाकाकशी के हमदम बने हैं।
खाये हुए धोखे भी अच्छे लगे जो तूने दिये।


मांग कर ले ही गए थे हमीं से तेल और बाती।
बदले में मिले ठेंगे अच्छे लगे जो तूने दिये।


लोग हँसते हैं आज हमीं पे खूब बनाया हम को।
हिस्से आए हैं अंधेरे अच्छे लगे जो तूने दिये।


-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद ।

नव गीत - उम्मीद करना व्यर्थ है

पत्थरों से
गीत की
उम्मीद करना
व्यर्थ है।

कान जिसके
वज्र से
उसको सुनाना
व्यर्थ है।

हाथ जिसके
बंध गये
उसको बुलाना
व्यर्थ है।

आँसू जिसके
जम गए
उसको हँसाना
व्यर्थ है ।

भाव जिसके
बढ़ गए
उसको मनाना
व्यर्थ है ।

-
त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

Sunday, 29 December 2013

संबंध और सरोकार

जो सोये हैं, उनके पास नींद है ,
वे जिंदगी में अकेले हैं ,
या, उन को किसी से कोई ,
सरोकार नहीं
जैसे बर्फ का अकेले सोना
परंतु पानी का निरंतर जागना ।

संबंध और सरोकार
कभी चैन से
रहने ही नहीं देते ,
ये दोनों नित्य ही,
दिमाग में घंटियाँ बजाते रहते हैं
जैसे रेल पटरियाँ और स्टेशन। 

दिमाग में बजती घंटियाँ,
किसी खतरे को,
या,किसी अनहोनी को बताती है ,
ऐसी स्थिति में,
बजती हुई घण्टियों के आगे,
नींद नहीं टिका करती
जैसे दौड़ती व्याकुल नदी ।

जवान लड़की ,
जिसे अभी खिलखिलाना है,
किसी गुलाब की मानिंद,
वह अपने ही शोहर की ,
बदमिजाजियों की वजह से रोती है
जैसे झर रहा हो नर्म झरना। 

पिता का संबंध
अपनी जवान बेटी से है ,
और बेटी की जिंदगी से,
उसे सीधा सरोकार है,
अब भला संबंध और सरोकार के रहते ,
नींद आए तो आए कैसे?
जैसे बहती हवा में दीपक का लड़खड़ाना ।  


-त्रिलोकी मोहन पुरोहित राजसमंद। 

Friday, 20 December 2013

प्रतिक्रिया

धरती के जिस टुकड़े पर
नहीं होता है
हमारी देवियों और भद्रपुरुषों का सम्मान,
तब ऐसी स्थिति में वहाँ
कुछ भी उचित नहीं है हमारे देश के लिए।

वह धरती का टुकड़ा
निरा अंध और सवेदनहीन जैसे नगरसेठ
जिसे मतलब है अपने से
अपने ही हित से ।
ऐसे में उस नगरसेठ से
मान-सम्मान की करना आशा
व्यर्थ हुआ करती है ।
उस से अपने स्वत्व की याचना करना
अपनी संस्कृति के खिलाफ जाती है ,
तब अपनी संस्कृति
चिल्ला-चिल्ला कर कहती है-
पुत्रों ! संगठित प्रतिक्रिया ही है इस का समाधान ।

प्रतिक्रिया से समझौता करना
उचित नहीं हुआ करता है
की गयी प्रतिक्रिया को अनदेखा करना
उस से भी अधिक घातक हुआ करता है,
जैसे रूज़ग्रस्त तन
अपनी पीड़ा के विरोध में
कराह कर प्रतिक्रिया दर्ज करता है ,
कराह में उत्पन्न आर्तनाद स्वरूप प्रतिक्रिया को
अनदेखा करना मृत्यु को
मुक्त निमंत्रण देना होता है ।

प्रतिक्रिया सिहासन से वीथी-वीथी तक होगी
तभी नगरसेठ सा
वह भ्रमित अहंकारी अमरीका समझेगा
किसी देश की संस्कृति का शुचि विधान ।
नहीं हुई ठोस प्रतिक्रिया तब
फिर-फिर कर होगी पुनरावृत्ति ,
अपमानों की काली शृंखला की ।

क्या तुम मरे हुए से हो ?
यदि नहीं तो उचित समय पर
उचित प्रतिक्रिया दर्ज करना भी तो है राष्ट्रीयता ।

स्वस्थ देश के स्वस्थ विकास के लिए
प्रतिक्रिया है अत्यावश्यक सी
यह प्रतिक्रिया ही हमें लौटाती है –
हमारा स्वत्व और सम्मान ।
कविता तुम चुप मत होना ,
तुम्हें तो हर कोई सुनता है ,
वह अपमानित जन हो
या नगरसेठ या अमरीका । 

Wednesday, 27 November 2013

संधान

लिजलिजी भावनाओं से
पैर पूरी तरह 
जम गए हैं
जैसे–जैसे हिलता है
उतर जाता 
बहुत गहरे
जैसे किसी 
सूनी जगह के
भयानक दलदल में
उतरता चला जाता
कोई 
निरीह चोपाया।

भावनाओं के इस 
लिजलिजे खेल में
जो भी उतरा
कभी नहीं जीता
वह छला गया
जैसे छला जाता है
वेणुवादन के
मधुर नाद में
कोई निरीह कुरंग
जिसकी प्रतीक्षा
कर रहा संधान ।

त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमंद (राज॰)
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Tuesday, 8 October 2013

कुछ नया होने को है

मुर्दनी माहोल में
सरगोशियां होने लगे
जब धुंआ यकायक भर उठे
तब मान लेना
कुछ नया होने को है।

नित नए संत्रास से
वातावरण गर्माने लगे
जब धरा रह-रह जल उठे
तब जान लेना
कुछ यहाँ होने को है।

जिंदगी की हाट में
श्वांस महँगी होने लगे
जब मुट्ठियाँ कसने लगे
तब देख लेना
कुछ उलट होने को है।

मृत्तिका के सृजन से
सुर्ख सूरज तपने लगे
जब धरा पाटल सी लगे
तब कह लेना
उत्सर्ग ही होने को है।

कुछ नए की चाह में
सब हव्य ही होने लगे
जब हवन खुद होने लगे
तब सीख लेना
व्यर्थ सब जलने को है।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द। 

Saturday, 21 September 2013

सच पूछो तो बात अलग है।।

कोरे कागज़  
काली स्याही जब शब्दों से 
खरी बात कह आग लगाती   
सच पूछो तो
बात अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।। 

पुष्पित उपवन  ,
अपने माथे अंगारों से  
पुष्प सजा विद्रोह दिखाता 
शपथ से कहता
आग अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।। 

जब हंसों ने
मुक्ताओं का मोह छोड़ के 
पाषाणों को राग सुनाया 
ज़रा कान दो
राग अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।। 

अलमस्तों ने
प्राण हथेली पल में रख कर 
प्राणों को निज देश पे वारा 
सुर्ख धरा का
भाव अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।।  

शव सा रह के 
कब तक शोणित व्यर्थ करेगा
ज़रा कपोलों पर शोणित मल
दीवानों का
फाग अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।। 

इतिहासों ने
उसे सहेजा जो लीक छोड़ के   
आँख मिलाने  चला काल से 
यह जीवन का 
भाग अलग है।
सच पूछो तो
बात अलग है।।  

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द ( राजस्थान ) 

संवेदना तो मर गयी है

एक आंसू गिर गया था , एक घायल की तरह . तुम को दुखी होना नहीं , एक अपने की तरह . आँख का मेरा खटकना , पहले भी होता रहा . तेरा बदलना चुभ र...