Sunday, 2 April 2017

प्रेम की मुक्तावस्था

बांधने की कोशिश में 
भूल ही जाते हो कि 
बांधने वाली मूंज की 
खुरदरी रस्सी 
प्रथम तो बाँधने वाले के 
लिपटती है हाथों से 
अौर अंत में छोड़ जाती है 
निशान क्रूरता के।
तमाम बंधनों की 
सफलता पर
अपनी विजय तय करने वाले 
सुकोमल तंतुओं के आकर्षण को
पहचान लिया होता 
जहाँ समर्पण के विनय में 
जय - पराजय नहीं रखते अस्तित्व
जहाँ बंधन के स्थान पर 
संबंध साँस लेते हैं।
देह के कसे क्रूर बंधन 
कब रोक पाए 
प्रेम की मुक्तावस्था को 
जहाँ पर आत्मा 
खुली आँखों के समक्ष 
अपने प्रियतम से 
दिवस भर में 
हजार अभिसार करती है।
तृप्ति मिलती है बंधनों में 
तो कर ही लीजिए पूर्ण 
मन की इच्छाएं 
जो विवश करती है दमन के लिए 
परंतु तरल आत्मा फिर भी 
बंधनों के पार जाएगी
अभिसारण करने के लिए 
जैसे रिसकर चली जाती है रोशनी 
अंधेरी कोठरी के 
महीन छिद्र से बाहर
यह चुनौती कमतर नहीं है 
क्रूर बंधनों तुम्हारे लिए ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।


Thursday, 7 January 2016

तब तक हूँ सुरक्षित

शहर के तमाम रास्ते 
बंद कर दिए हैं 
घर पहुंचने के लिए 
जहाँ गली के नुक्कड़ पर
कर रहे होंगे प्रतीक्षा 
धूल सने चिथडों में 
लिपटे मेरे मित्र।
कौन अपना कौन पराया? 
सब लगे हैं इसी जुगत में 
साथ वाले को 
कैसे चटाई जा सकती है धूल 
कैसे चढ़ा जा सकता है 
उसकी पीठ और कंधे पर 
किसे पड़ी है कि
वह चिंता करे 
मेरे या तेरे बारे में 
सुबह के निकले 
घर पहुंचेंगे भी या नहीं..... 
बेचारे विवश हैं सत्ता के पीछे।
मेरे मित्रों को नुक्कड़ पर देख
कहीं चली जाएगी 
मेरी थकान भूख-प्यास 
छाँव की तरह 
पीछा करने वाला डर 
गीदड़ की तरह 
भाग कर कहीं छिप जाएगा 
मैं कम से कम अपने घर तक 
जाने वाले रास्ते पर 
तब तक  हूँ सुरक्षित 
जब तक चिथडों में 
व्याकुल मित्रों को 
सत्ता की भूख नहीं लगती।
.- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।


सब का स्वागत

नये वर्ष में प्यारे मित्रों 
सब का स्वागत। 
खुशियों के हर क्षण का अपने 
घर में स्वागत।।
धवल कीर्ति की विमल पताका 
आना-आना घर-घर आना। 
नवल सृजन की सरस फसल को 
लाना-लाना आँगन लाना।
स्वागत-स्वागत नये वर्ष में 
यश का स्वागत। 
खुशियों के हर क्षण का अपने 
घर में स्वागत।।
उत्साहित आनन से कर्मन 
गढ़ते हुए बढ़ बढ़ जाएँ। 
मन प्रफुल्लित से फलश्रुति को 
रचते हुए मढ़- मढ़ जाएँ।
सरल पथों सह विरल पथों पे 
ऊर्जा का स्वागत। 
खुशियों के हर क्षण का अपने 
घर में स्वागत।।
भोर उजाला लेकर आए 
संध्या लाए घर-घर खुशियाँ। 
अगल-बगल सब गायन गाए 
उत्सव की रहे रंग रलियाँ।
रोग-शोक से दूर रहें सब 
मित्रों का स्वागत। 
खुशियों के हर क्षण का अपने 
घर में स्वागत।।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।


तलाश में हूँ

जिंदा हूँ या मरा हुआ 
तुम ही अच्छे से बता सकते हो 
मैं तलाश में हूँ उनकी 
जिनके बिना जिंदगी सम्भव नहीं।
कहने को सब है 
नहीं है तो वे ही नहीं है 
वे नहीं तो फिर कुछ भी नहीं 
इसी कारण नित्य मारा जाता हूँ।
उन्हें पाने के पागलपन में 
कई अमीर फकीर हुए हैं 
कई सूली पर चढ़ा दिए गए हैं 
यह रास्ता आग से दहकता है।
वे रईस हैं और महल में हैं 
मैं गुमनाम रास्तों पर सफर पर हूँ 
चलकर भी उनके पास पहुंचना है 
मरकर भी उनके पास पहुंचना है।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

हमारी लड़ाई

सुनाई देती है
हर क्षण आहट
जैसे वे आ रहे हैं
पास..... पास और बिल्कुल पास
टटोलते हैं माहोल को 
तब होता है वायवी अनुभव
यही समय होता है
अभिव्यक्तिै के लिए खतरा
क्या कहें -
वे हैं या वे नहीं है?
मानो यह समय
बर्फ जमी ऊँची पहाड़ी के
शीर्ष पर पहुंचने का है
जहाँ ठहराव में भी
और उतराव में भी
हमारे जीवन के लिए
भरी हुई है चुनौतियाँ।
वे नहीं मिलते हैं
लाख कोशिशों के बाद भी
जबकि कहती है आहट
वे हैं आसपास ही
उम्मीद है कि
अब भी वे मिलेंगे
यह वैसी ही है उम्मीद
मानो जीर्ण-शीर्ण होकर
बंद पड़े थिएटर के सम्मुख
कोई थिएटर प्रेमी
आज भी फड़फड़ाते पोस्टर का
करता है इंतजार
अब सवाल यह है कि
उन्हें कोई समझाएगा
या हमें कोई समझाने का
उठाएगा बीड़ा ।
यह विचित्र लोगों का है देश
जहाँ प्रेम पर
होते हैं अलसुबह प्रवचन
लोग प्रवचन के साथ-साथ
करते हैं उसके निर्वहन का प्रण
लेकिन दिन के बढ़ने के साथ
आ जाते हैं वे आदिम अवस्था में
प्रिय की आहट और अस्तित्व
खो जाते हैं आदिम प्रवृत्तियों में
मानो भूचालन से मलबे के ढेर में
बच्चे के रंगीन खिलौने कहीं
दब से गए हैं
अंत तक रहेगी निरंतर हमारी लड़ाई
आदिम प्रवृत्तियों के विरुद्ध
प्रेम की विशुद्ध प्रतिष्ठा के लिए।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

केंचुए से लोग

भूख और प्यास के समक्ष 
झुक जाते हैं लोग 
लेकिन खड़े हो जाते हैं 
स्वत्व और अस्मिता के
सवाल के आगे 
मामूली से गिने जाने वाले 
केंचुए से लोग 
तमककर उछल आते है 
तब सिंहों की तरह 
या,
दबाए गए फणींद्र की तरह
उस समय बचाव के अतिरिक्त 
कुछ भी नहीं रहता शेष 
दमन और दलन के पास
इतिहास बदलते हैं 
वे ही केंचुए से लोग ।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

मुक्ति के लिए

मुक्ति का अर्थ है मुक्ति में
हम भटकते हैं मुक्ति के लिए 
दीवारें और दीवारें 
पत्थर और पत्थर 
शून्य और शून्य .......
ये सब आते हैं जिंदगी में 
मुक्ति के अभाव में 
जैसे जीवन हो जाता है विवश 
दृष्टि के अभाव में 
रतजगे जैसी परंपरा के नाम पर।
मुक्ति के अर्थ को 
वे कैसे जान सकते 
जो अक्सर पंख बांधने के 
हूनर को तराशते रहते 
जैसे बहेलिया पक्षी को
फाँसने का हूनर 
नित्य ही तराशता रहता 
मानो यही है उसकी जिंदगी का सत्य।
बहेलिया छू नहीं सकता गगन 
उसमें उड़ान भरने का होंसला नहीं 
बहेलिया ऊंचाई भी नाप नहीं सकता 
उससे स्वप्न नहीं देखा जा सकता 
बहेलिया गा नहीं सकता 
वह प्रेम से परिचित ही नहीं 
वह कैद है स्वयं में 
अतः अपनी निजता के लिए
सभी को कैद करता है 
वह क्रूर है इतना इसलिए कि
उसका मुक्ति से नहीं है परिचय।
मुक्ति के लिए छटपटाने पर 
मुशकें और एड़ियाँ बंधनों से 
उसी तरह छिल जाती है 
जैसे छिल दी गई हो 
रसोई में तरकारी 
पीठ जलती है घिसटने से 
मानों किसीने तैश में आकर 
नर्म चर्म पर मल दिया हो खार 
आत्मा गंदे और भद्दे शब्दों से 
मुक्त होने के लिए 
हो जाती है तार-तार 
जैसे गिलहरी ने कुतर दिया हो 
महीन मलमल का सुकोमल वस्त्र 
इतने सब पर भी हमें चाहिए मुक्ति
चाहे दीजिए संत्रास जी भर-भरकर।
चारों तरफ है 
साँय-साँय करता भयानक सन्नाटा 
जहां जिंगूर चीखते रहते 
रोशनी के अभाव में 
हर आकृति भयावह होती हुई 
चमकाती है दंतावली 
आँगन इतना चिपचिपा कि
रेंगती रहती हैं लिजलिजी सी जोंक 
तिसपर गर्म सलाखों से शब्द 
हृदय को भेदते ऐसे 
मानो काटते सजा काले पानी की 
फिर भी ........
अंतिम सांस तक उम्मीद है 
संवेदनहीन पत्थरों से 
मुक्ति मिल जाएगी इक दिन ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।


संवेदना तो मर गयी है

एक आंसू गिर गया था , एक घायल की तरह . तुम को दुखी होना नहीं , एक अपने की तरह . आँख का मेरा खटकना , पहले भी होता रहा . तेरा बदलना चुभ र...