Sunday, 15 September 2013

राम तेरे वंदन से , बैठा रहा कौन यहाँ ,
मैं भी गति पा कर के , गढ़ चढ़ जाउंगा.
राम नाम गान सुन , आसन जमाती रमा ,
राम गान बल पर , अर्थ गह जाउंगा.
क्षण-क्षण अघ चढ़ , भार चढ़े जाता यहाँ ,
राम की कृपा से अब , पुण्य-पथ जाउंगा.
नाम मात्र लेने से ही , वैखरी मचल उठे ,
रसहीन हो कर भी , काव्य रच जाउंगा.

प्रभु राम विनती है , सुनिये विनय मम ,
प्रभु के भरोसे मैंने , आज भंग खाई जो.
सुधि जन वृन्द मध्य , बैठे कई कवि-वर,
सब मध्य रचनी जो , राम कविताई जो.
राम कथ्य विविध है , विविध चरित्र वहां,
रस के रसाल सम , छंद मनोहारी जो.
मांगता त्रिलोकी अब , दया कर दीजिए ,
सुन्दर कविता रूप , रस में रचाई जो.

राम का मधुर रूप ,सीता सह शोभता हैं,
गजानन आकर के , दर्शन कराइए .
आसन विराज कर , गणपति महाराज,
रिद्धि-सिद्धि-बुद्धि सह , काव्य को रचाइए .
भगवती भारती भी , अब शीघ्र आ कर के ,
राम-काव्य रचन में , स्वर भर जाइए .
राम कथा पारावार , जननी पीयूष सम ,
बालक अबोध तव , पीयूष पिलाइए.

नित्य रत रहते हैं , सरस सृजन हेतु ,
सरस सृजन हेतु , जगत प्रमाण है.
जगत उदार हेतु , दिव्य-काव्य रच दिए ,
दिव्य काव्य-दर्शन में , वेद ही प्रमाण है.
सृजन के मार्ग हेतु , ऋत सत्य साथ कर ,
सृष्टि का सृजन किया , भारती प्रमाण है.
कविवर प्रजापति , बार-बार वंदन है,
प्रतिनिधि मात्र बनूँ , रचना प्रमाण है .

ममता की निधि आप , मां भवानी भगवती ,
बुद्धि का प्रवाह रहे , ऐसा वर दीजिए .
बुद्धि सह श्रद्धा रहे , श्रद्धा सह शक्ति रहे ,
शक्ति में विनय रहे , ऐसा वर दीजिए.
राम गुण गान रहे , लोक का निर्माण रहे,
रावण विध्वंस रहे , ऐसा वर दीजिए.
राम का विरुद रहे , वर्तमान साथ रहे ,
लेखनी प्रबल रहे , ऐसा वर दीजिए .

ऊँचे नग वास करे , डमरू निनाद करे ,
भस्म अंगराग करे ,वैराग्य के धाम हैं.
मृग चर्म वेष करे , नाग कंठ हार करे,
बिल्व अनुराग करे , मंगल के धाम हैं.
देव शिव गान करे , नर शिव जाप करे,
सर्वत्र संहार करे , कलाओं के धाम हैं.
भवानी को साथ करे , अगुण-सगुण करे,
भोलेनाथ कृपा करें , आनंद के धाम हैं.


- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

No comments:

Post a Comment