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Showing posts from May, 2012

मरना भी तो सीख ज़रा.

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सीढ़ी बनना कब छोड़ेगा , चढ़ना भी तो सीख ज़रा.
मुंह की पट्टी कब खोलेगा, कहना भी तो सीख ज़रा.

दे कर ठन्डे जल की फुहारें , तुझ को बहलाया जाता. ज्वाला से क्या घबराना है , तपना भी तो सीख ज़रा .
तेरे कंधे पर चढ़ कर सब  , ऊँचे आसन बैठ गए वे . काहे कहारी में लगता है  , कटना भी तो सीख ज़रा.
फिर यह लोहा तपने वाला , इस में इंधन जोंक ज़रा. सर थामे क्यों बैठा रहता , धमना भी तो सीख ज़रा.
नई रोशनी की चाहत में , बन के पतंगा देख 'त्रिलोकी'. गांधी जी का  देश है प्यारे , मरना भी तो सीख ज़रा.

हमें बांटने वालों को देख .

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मरहम को क्या रोता  पगले, अपने गहरे घावों को देख .
मरहम तो मिल जायेगी ही , पहले नश्तर वालों को देख .

भूख लगी तो रिरियाता क्या , पगले काहे को दुहरा होता   .
हाथ  जोड़ने से क्या  मिलता , कोर छीनने वालों को देख.

नंगेपन में तेरा दोष नहीं है , क्यों सहम के गठरी बनता है.
अस्मत की क्या भीख मांगता  ,वस्त्र फाड़ने वालों को देख.

भाग रहा है तू कब से पागल , क्यों न शहादत सीख गया .
कब से ही छप्पर थाम रहा है , घर उजाड़ने वालों को देख .

आँख मूँदने से क्या होता , आँख खोल के देख "त्रिलोकी".
कुछ लोग प्यार से नहीं मानते , हमें बांटने वालों को देख .

डरता है तो तू प्यार न कर.

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चलना है तो विचार न कर .
डरता है तो तू प्यार न कर.

वे पागल कहें  तो कहने दे.
समझे का तू करार न कर.

अब शोशे खूब उछालेंगे वे  .
रिश्तों में तू दरार न कर .

हैं अंधे-बहरों के सब टोले .
व्यर्थ यहाँ तू विलाप न कर .

सब है बेदम अरे "त्रिलोकी".
इन मुर्दों पे तू प्रहार न कर .
मैं मिट्टी का कण 

मैं मिट्टी का कण , हूँ तो हूँ ,
हूँ अपने में परिपूर्ण , यही मेरा विश्वास. 
निश्चित  है मेरा रंग -रूप , निश्चित  है आकृति -प्रकृति , निश्चित  है यति - गति , निश्चित  है रस - गंध . नहीं तरल  हूँ , नहीं सरल  हूँ , फिर भी, उज्ज्वल है इतिहास  यही मेरा विश्वास. 
वीथी से पक्के पथ पर मैं, निर्जन वन से बस्ती तक मैं , कच्चे-पक्के सब सदनों में , ऊपर- नीचे , सब कोनों में . मटमेला मिट्टी का कण  हूँ, फिर भी, निश्चित  है विलास  , यही मेरा विश्वास. 
नहीं  पुष्प हूँ , नहीं  रत्न  हूँ , मुग्धा का हूँ नहीं स्वर्ण-हार . नहीं नक्षत्र-रवि-मयंक हूँ , नील नभ का हूँ नहीं श्रृंगार , ये सब रज-कण की कृतियाँ, फिर भी, मिलता है उपहास , यही मेरा विश्वास.
ब्रह्म-रूप में श्रष्टा मैं हूँ , हरि-रूप में भर्ता मैं हूँ, हर रूप में हर्ता  मैं हूँ ,  ऋत-सत्य-तप भी मैं हूँ . मुझ में अक्षय ऊर्जा श्रोत , फिर  भी, विमुख  रहा  उल्लास , यही मेरा विश्वास .
भोगवतीपुरी अद्य , रखती है  रण-चिह्न ,                दशग्रीव-नाग  युद्ध , किसने भुलाया है. कैलास-शिखर जहां, कुबेर का गढ़ वहां,                युद्ध छेड़ रावण से , लंका को गंवाया है. वर वीर रावण से ,मय तक काँप गया ,                 दे कर के आत्मजा को,जामाता बनाया है. सहोदरा कुम्भीनसी , पति मधु दानव जो ,                 रावण  से  रण  चाह , मर्दन  कराया  है . 

खोया-खोया रावण को , देख निशाचर कहे ,                 दश दिशा जयघोष , आप के ही गूंजते. वासुकी-तक्षक हारे , शंख-जटी नाग हारे ,                 रावण का नाम सुन , अचला को चूमते . वरुण  के पुत्र  सारे  , रावण  की असि देख ,                 बावरे वो हो कर के , यत्र - तत्र  घूमते . यमराज सैन्य - दल , युद्ध  में कुचल कर ,                  काल आप रोक कर ,स्वच्छंद हो झूमते .

कई - कई ऋषि हुए , जपी - तपी सिद्ध हुए ,                   रावण सा साधक तो , कृपा कर कह दें . देवाधिदेव शिव के , वर से सायुज्य हो के ,                   रावण सा सम कौन , कृपा कर कह दें . अगणित वीर यहाँ , तिस पर इन्द्रजीत ,                   इन्द्रजीत सम अन्य ,कृपा कर कह दें . इन्द्र मुक्ति हेतु…
विश्वरूप  माँ 



आशाओं पर पानी फिरता , मैं  उदास जब थम  जाता । अम्मा तेरे आँचल  में ही , स्वप्नों की  फसल  उगाता ।

बस्ती की संकरी गलियों में ,
गेंद-पतंगें-कुल्फी  दिखती ,
खिड़की  से तब  मेरी आँखें,
हम उम्र की भीड़ से लगती .


बाबा के  अनुशासन  चलते , मेरा स्वर घुट-घुट  जाता।
तब  तरकारी  के  पैसों  से , अम्मा  से  चवन्नी  पाता।
आशाओं पर .......................................................


भरी   दुपहरी तपी धूप में ,
भारी  बस्ता  पीठ  दुखाए  ,
विद्यालय  से मिली ताड़ना, कान - हथेली को झुलसाए .


तिस  पर अंकित  रक्तिम लेखन  , खूब  रुलाई  दे  जाता।
अमराई   सा   तेरा   आँचल , मधुर   दिलासा  दे  जाता। 
आशाओं पर .......................................................


जब फेल-पास के पत्रक पर,
अल्प अंक का साया छाता,
अनजाना भय नाग बना तब , प्राण शलभ  को डस जाता .


बोझिल  कदमों  से  घर  पर  , स्याह  उदासी  भर जाता।
अम्मा तुझ से चुम्बन  पा कर , नव  उमंग से भर  जाता। 
आशाओं पर .......................................................


बाबा ने जब आँख मूँद ली, घर का बोझ खूब  सभाला, मोदी की तू दाल  बीन कर, घर का छकडा खूब बढ़ाया.
तेरा …
एक कपि हनुमान , लंका में निश्शंक हो के,
                  भ्रमण वो कर-कर , सब देख जाता है .
भ्रष्ट कर के व्यवस्था,उपवन में पहुँच  ,
                  रक्ष वीर मार-मार,सीता देख  जाता है .
राम सहिदानी दे के,सीता का सन्देश ले के,
                  प्राण प्यारी लंका को वो,दहे चला जाता है.
हो कर के स्वच्छंद वो,करता है विध्वंश वो .
                  स्वर्ण चैत्य प्रासाद को , ढूह कर जाता है .

कपि-ऋक्ष-वनवासी,ले कर के अब राम ,
                  जलधि के तट तक , सहज में आ गए .
बलशाली कपि वीर , भीमकाय ऋक्ष वीर,
                  श्रमशील वनवासी , घन सम आ गए.
लक्ष्मण है वह्नि सम, सुग्रीव है क्षपा सम,                   अंगद भू-कंप सम , वर वीर आ गए . जाम्बवंत-हनुमान , नल-नील-सुषेण जो, रामज्वालामुखी सह,विस्फोट से आ गए .

कई-कई युक्ति कर ,शीघ्र सेतु बाँध कर ,
                  वारिधि को पार कर,लंका चढ़ आयेंगे.
कपि मात्र एक आया ,छिन्न-भिन्न कर गया,
                  अब राम लोक सह , रोक नहीं पायेंगे.
समय है अभी शेष , मन्त्र चाहिए विशेष ,
                  एक मत होने पर , सही दिशा जायेंगे .
स्वर्ण लंका रावण के , शोणित से सिंची…

वे बिसरा कर चल दिए,रोज रटूं मैं नाम

वे बिसरा कर चल दिए,रोज  रटूं मैं नाम . तन्हाई  में  रह गए  , आज  अकेले  राम .
अपने में ही डोल रहा हूँ , गांठे सारी खोल  रहा हूँ . कहाँ समर्पण  में अभाव था, अपने से ही बोल  रहा हूँ .
सारी चर्या  रह गई  , यही बचा एक  काम . वे बिसरा कर चल दिए , रोज  रटूं मैं नाम .
मुश्किल से दिन  काट  रहा हूँ , मानो गिनती की  रही  श्वांस  नित  तन्हाई  मुई  मारती , ज्यों छाती चढ़ा पीवण  सांप.
रग - रग पीड़ा फैलती , मिला दर्द का गाँव . वे बिसरा कर चल दिए , रोज  रटूं मैं नाम .
मिले तो कहना आपका ही , सदा बना  रहूँगा  मैं ख़ास , सुख ने तो छल खूब किया है , पर तेरे दुःख का है विश्वास  .
उनके सभी किये उचित ,उनको कई प्रणाम . वे बिसरा कर चल दिए , रोज  रटूं मैं नाम .






मंदोदरी कह कर , रावण के वक्ष पर ,                  भाल रख कर श्रम ,परिहार चाहती.
हस्त भाल  पर धर ,रावण विलग करे,                  पर रानी लता सम,अवलम्ब चाहती . रावण का वक्ष तब,धड़क-धड़क कर,                  वह कुछ कह रहा,सुनना वो चाहती. समझ न सकी जब,वक्ष की धड़क को ,                  विलग वो हो कर के,नृप  को  निहारती. 
रावण विहंस कर,कुलीना को कह चला,
                 अरे प्रिये ! भय तव , नेह परिणाम जो. कथन मधुर अति , शीतल व तरल है,
                 ललना स्वभाव वश,ललित-ललाम जो . 
भय आप त्याग कर,रक्ष इतिहास देखो,
                 देव नर नाग पर , जय  अभिराम जो.
काल सम खड्ग मम ,मृत्यु सम धार सह,                  देखी कई वाहिनी को , देखे कई राम जो.

देवी ! हम चाहते हैं ,राम का निदान अद्य,
                 इस हेतु चिन्तना में,हम हैं लगे हुए.
आलोडन-विलोडन , हम नहीं मानते हैं ,
                 चित्त एक विषय पे , हम हैं धरे हुए .
सीता हर कर लाये , मान का विषय यह ,
                 कौन कह सकता है , हम हैं डरे हुए .
सभा का समय हुआ , अब हम चलते हैं ,
                 रण हेतु उत्साह से , हम हैं भरे हुए .

सभा मध्य वर वीर …