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Showing posts from August, 2011

अरसे तक बंद रहा , अघोषित कारा में

अरसे तक बंद रहा ,
अघोषित  कारा में,
सालता था वहां का   अकेलापन , अंधेरा
और - सीलन भरी दीवारें

घुटन और संत्रास से
मुक्ति के लिए,
उठते थे हाथ ,
होठों से बुदबुदाहट में,
निकलती थी प्रार्थनाएं -

हे; इन्द्र, वृधस्र्वा देवता;
मेरा कल्याण करो  ,
पूषा ,विश्ववेदा  देवता;
मेरा कल्याण करो   ,
तार्क्षयो , अरिष्टनेमि देवता;
मेरा कल्याण करो   ,
बृहस्पति देवता;
मेरा कल्याण करो ,
मुझे कृपा पूर्वक ,
कल्याण प्रदान करो

एक दिन प्रार्थना सुन ली गयी ,
और -
टूट गयी - कारा ,
मैं चुंधियाती आँखों से देखता रहा ,
आलोक का विस्तृत पुंज,
भागते हुए लोग ,
मानो  बह रही हो नदी ,
ऊभ - चूभ लहरों सी जनावलियाँ,

कोई किसी से मिलता नहीं ,
नहीं करता किसी से कोई बात ,
न ही किसी से कोई सरोकार ,
बस- हर कोई ,
एक दूसरे को धकेलते हुए,
निकल जाना चाहता  है  आगे,
अघोषित प्रतिस्पर्धा ,-
सब   कुछ बटोर लेने  की चाहत.

चाहता था कि-
रोकूँ किसी एक को
पूछ  लूं - क्यों भाग रहे हो ?
कई बार की कोशिश,
परन्तु हो न सका सफल ,
बरबस धकेल कर,
निकल जाती थी लहरें -आगे ,
जैसे फेलने को आतुर कसेला धुंआ,
अनायास मैं भी लगाने लगा-
"दौड़" ,
लेकिन हो ग…

जीवन एक उत्सव है ,जीवन है सामगान

जीवन एक उत्सव है , जीवन है सामगान  ,
 शिक्षा  उत्सव है, सुगंध है,
जिसे पाकर आदमी ,
पुनः - पुनः जीवित ,हो उठता है ,
जैसे थका - थका पथिक ,
तरोताजा सुमन - गंध पाकर,
या  -
मिट्टी की सोंधी महक पाकर ,
फिर -फिर बढ़ा लेता है जीजिविषा,
पढ़ना - लिखना मूल्यों के लिए ,
न कि मूल्यों के हनन के लिए ,
फिर एक बात बताओ मित्र -
बारूद से तुम्हारा रिश्ता क्यों है ?
तुम कुछ कहने से पहले सुनलो -
जीवन एक उत्सव है , जीवन है सामगान.

विज्ञान शीतल छाया है,
जिसे पाकर आदमी,
तपिष से बचता है,
जैसे - मरुस्थल में भटका - भूला जन ,
थोडी सी छाया पाकर ,
फिर से मरुस्थल से ,
लड़ने के लिए हो जाता है तैयार ,
 और-
मरुस्थल को बागवां में,
बदलने के लिए हो जाता है तत्पर ,
न कि , मरुस्थल को लहलहाने देता है ,
भयानक काल के लिए,
फिर एक बात  बतादो मेरे कान में-
आखिर आग्नेयास्त्रों से तुम्हारा रिश्ता क्यों है ?
 तुम कुछ कहने से पहले सुनलो -
जीवन एक उत्सव है , जीवन है सामगान.

साधन है शरबत की लुठिया,
जिसे पाकर हो जाता है आदमी,
रसमय ,
मानो रूखे-सूखे जीवन में ,
किसी ने गोल दी हो,
संबंधों की शक्कर ,
उस मिठास को पाकर ,
जीने के लिए सजा लेता…
कहाँ - कहाँ    खोजूं , किस  -  किस को  मैं  देखूं , याद  बहुत ही आती है, तुम  को  आता  मैं   देखूं ,

.समंदर सा  दहाडूं  , तुम  नदिया  सी  इठलाओ,
अपनी खुली हुई बाहों में, तुम्हें बंधा हुआ  मैं देखूं


तुम  रस  भरी  बेरी    सी , मैं  बहुत  ही  प्यासा,
हाथों   में थामे तुमको , होठों  से  सटा  मैं   देखूं .
.

मैं  कागज़ का कोरा पन्ना,तुम लिखी हुई इबारत
तुम  से ही मेरा   मकसद , तय  सदा  ही  मैं  देखूं
.

हाथों की लकीरों   में, लिखा   हो  तुम्हारा  मिलना,
कुछ और मिले ना मिले ,पर तुमको मिलता मैं देखूं


उम्मीद  बस  इतनी  सी ,जिन्दगी  की  डगर  पर,
तेरी  साँसों के साथ मेरी  ,साँसों को मिलता मैं  देख्नू.

जय  श्री  कृष्ण

संवाद के लिए , मुलाक़ात तो करें.

दूर क्यों खड़े , आओ बात तो  करें.
संवाद के लिए , मुलाकात तो करें.

सूनी - सूनी सांज,
उदास  है   प्रभात ,
दिग्भ्रमित है दिन ,
बर्फ  सी   है   रात .

मौन क्यों रहें ,आओ बात तो तो करें .
संवाद के  लिए , मुलाक़ात   तो  करें.

उलजनों की डोर,
गुच्छ   सी    बनी, सब प्रयास विफल , गुत्थियां      तनी   .

हठ   क्यों   करें , आओ  बात तो करें . संवाद के  लिए , मुलाक़ात  तो करें.

कागज की सही , छोटी  नाव तो तिराएँ , गीली रेत के सहारे , कुछ अपना बनाएं ,

विवाद क्यों करें  , आओ बात  तो करें , संवाद के  लिए , मुलाक़ात   तो   करें .

बहती हुई नदी

सत्य से अनजान रह ,
तथ्यों से आसक्ति ,
कर रही है सीमित,
जीवन गंध के श्रोत,
जैसे बांध दी गयी हो ,
बहती  हुई नदी .

नदी बंधती नहीं .
बस बदल जाती है,
एक ताल में,
जहां  पर डेरा डाल   देते हैं   ,
रंगीन मिजाज मछेरे ,
उन्हे क्या लेना देना ,
नदी के सुदीर्घ प्रवाह से , जहाँ  बसती है बस्तियां  ,
लहलहाते हैं  खेत ,
पनपते हैं  वन - उपवन ,

उन्हें  चाहिए मात्र-
अपने -अपने  जालों  में ,
अपने -अपने मतलब की मछलियाँ

पकड़ी गयी मछलियों से,
बनायेंगें  अपनी-अपनी पेठ , समाज मे तथाकथित प्रतिष्ठा,  और-  साधने की  कोशिश करेंगे , सत्ता के घोड़े , जिससे सत्ता के रथ में बैठ , वहां  कर सके ,  सत्ता के गलियारे में, स्वच्छंद चहलकदमी  ,  जैसे-
अँधेरे और जुर्मुटे में  रेंगते हैं ,  निगलने को आतुर भीमकाय अजगर.
शवों के ढेर पर ,
टिकाये अपना खंभ , चाहते हैं  बटोरना तथ्य ,  मसलन कि--
पैसा , जमीं , ताकत ,  और- इनके बलबूते पर,
कर लेना चाहते  हैं ,  मुट्ठी में ,  तरल सुकोमल सुगन्धित सत्य ,   मानो जकड़ लेना चाहता है  ,  गजशावक,     शंख- पुष्पी का सुकोमल,  श्वेत,अमृत बूँद सा पुष्प .

जय श्री कृष्ण

जय श्री कृष्ण

जन्माष्ठमी की शुभकामनाये

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आज के इस पावन अवसर पर आप सभी को शुभकामनाये !
नन्द घर आनंद भयो, जय कन्हेया लाल की


त्रिलोकी मोहन पुरोहित

Janmashtami Utsav

Wish all your near and dear ones a joyous Janmashtami. It is an appropriate time to let someone know how much you care. A time for not only showing respect to elders but also regard their religious sentiments. Think a little and send your creative and heart felt messages to us. We shall publish your message along with your name. The space is all yours!!