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Showing posts from February, 2012
एक उच्च भू धर पे , रावण का दुर्ग बना ,
                     स्वर्ण दुर्ग से सज्जित , स्वर्ण नगरी वहाँ ,
स्वर्ण नगरी बसी है , भूधर के चहुँ ओर ,
                     सुन्दर  सदन  कई , नभ  छूते  हैं वहाँ ,
विस्तृत है राज पथ , विस्तृत है वीथियाँ ,
                     गज-अश्व की सवारी , रथ  फिरते वहाँ .
स्वेच्छाचारी रक्ष -वृन्द , मकारी में  रत रह ,
                      प्रकृति  विरुद्ध  कर , भोग  करते  वहाँ .


प्रभु ! स्वर्ण मणियों से , हर एक रचना है,
                      स्वर्ण-मणि मिल कर , आँखे चुंधियाती है.
पद -पद मधुशाला , अगणित वधशाला ,
                      स्वेच्छाचार देख कर , आँखें नम होती है .
रक्षण के हेतु वहाँ , ठोर -ठोर सैन्य दल ,
                      शस्त्रागार कई जान , श्वाँस रुक जाती है.
कारगार भरे हुए , देव नर नाग से ही ,
                      उनका शोषण देख  , करुणा ही आती है.


द्वार - द्वार पालक हैं , वर वीर मल्ल यत्र ,
                      हर एक द्वारपाल , सजग हो रहता.
दश दिशा शिविर में , सुदृढ़ है सैन्य-दल ,
                      कुशल है युद्ध हेतु , अभ्यासी हो रहता.
युद्ध हेतु दशग्रीव ,…
हनुमान विनत हो , कहते हैं सभा मध्य ,
                      लंका बनावट को मैं , देख कर आया हूँ .
पीन परकोट तत्र , द्वार चार-चार यत्र ,
                      जटिल है यंत्र-तंत्र , ज्ञात कर आया हूँ.   
वारि युक्त खाई जहाँ , भयंकर जलचर ,
                      पद-पद काल देख  , बच कर आया हूँ .
वर वीर युक्त दल , सुविस्तृत है वाहिनी 
                      रावण की क्षमता को , तोल कर आया हूँ.

सदन बने हुए हैं , पीन परकोट पर ,
                     परकोट पालक जो ,निशाचर रहते .
हर एक द्वार पर , काष्ठ सेतु बने हुए ,
                     वारि युक्त खाई पर , आच्छादित रहते.
कई-कई यंत्र वहाँ , स्वतः संचालित हैं ,
                     अरि और मित्र पर , तीक्ष्ण दृष्टि रखते.
यत्र-तत्र सैन्य-दल , रक्षण में लगे हुए ,
                     आगमन - निर्गमन ,  उचित परखते .

नद-नाल कई-कई , सघन है वन वहाँ ,
                      दुर्गम  भूधर  वहाँ , गमन  कठिन  जो .
गह्वर हैं खड्ड जहाँ , दुर्गम है घाट वहाँ , 
                      रवि-चन्द्र दिखे नहीं , अन्धकार राज जो.
है भूल भूलैया अति ,विभ्रम ही विभ्रम है ,
                      दिशा…
राम ! अपनी  क्षमता , अल्पतर न मानिए ,
                        ब्रह्म-विद्या से सम्पन्न , अनुपम वीर हैं.
पारावार विस्तृत है , भयंकर मान लिया ,
                        तेज  आगे  तुच्छ वह , अतुलित वीर हैं.
रावण से निशाचर , कौतुक में मारे कई ,
                        कोई नहीं प्रतिस्पर्धी , अद्वितीय वीर हैं .
अनल-अनिल विद्या , वारि विद्या में प्रबल ,
                        अष्ट-सिद्धि से सायुज्य , सर्वोपरि वीर हैं.


प्रभु ! बहु शास्त्र विज्ञ , तीक्ष्ण बुद्धि से सायुज्य ,
                         वारिधि लंघन हेतु , साधन को सोचिए .
शोक और हताशा को , शीघ्र त्याग स्वस्थ हो के ,
                         उत्साह संचार कर , प्रेरणा को दीजिए .
लक्ष्मण अंगद अत्र , हनुमान ऋषभ से ,
                         नील सह कई वीर , ओज भर दीजिए .
लंका तक जाने हेतु , सेतु के निर्माण हेतु ,
                         वर वीर सब आये , मंत्रणा को कीजिए .


सुग्रीव उद्बोधन से , राम स्वस्थ हो के कहे ,
                         कठिन कराल कार्य , तप से संभव है.
वारिधि लंघन हेतु , वाहिनी वहन हेतु , 
                         सेतु का सृजन अत्र , …
चिंतामग्न राम देख , सुग्रीव यों कहते हैं,
                      प्रभु ! सीता-उद्धार में ,  देर नहीं कीजिए .
आप के आदेश में ही , सब वीर बंधे हुए ,
                      हनुमान-अंगद को , मर्यादा में मानिए .
ऋषभ-सुषेण हो या , चाहे गंधमादन हो ,
                      जाम्बवंत-नील में से , कोई आप चुनिए .
रावण विध्वंश हेतु , सीता के उद्धार हेतु ,
                      पर्याप्त है एक वीर , आदेश तो कीजिए .


राम कहे सुग्रीव से ,  मित्र वरक्या कहूं ?
                       मैं भी शीघ्र चाहता हूँ , जानकी उद्धार को .
मूल्य सब तिरोहित , हो गये व्यवहार से ,
                       बन के कपोत चले , गगन  विहार  को .
जानता हूँ राघव से , लोक को अपेक्षा बहु ,
                       इस  हेतु  चाहता  हूँ  , रावण  संहार  को .
मध्य में है प्रसरित , पारावार भयंकर ,
                       घेर  लेती  हताशाएं , करता  विचार को .


करबद्ध सुग्रीव हो , कहते हैं राघव से ,
                        शोक ग्रस्त मन सदा , बुद्धि कुंद करता .
शोक और विषाद तो , प्रकल्प में बाधक हैं ,
                        अरि भाव युगल तो , कर्म भ्रष्ट करता .
हताशा…
 जाम्बवंत कथन का , मंतव्य समझ कर ,
                        कपिराज चल दिये , राघव से मिलने .
अग्रगामी  सुग्रीव हो , पश्च हुए जाम्बवंत ,
                        हनुमान साथ लिये , संवाद को करने .
यूथपति -सेनाधिप , हो गये हैं अनुगामी ,
                       अनुभव-कौशल को , राजीव से कहने.
देखा राम-लक्ष्मण ने  , सुग्रीव सदल आये ,
                        भ्राता द्वय बढ़ गये , सुहृद से मिलने.


सुग्रीव-लक्ष्मण सह, राम श्रृंग शोभते,
                         ऋक्ष श्रेष्ठ जाम्बवंत ,  संवाद को कहते .
प्रभु ! सैन्य दल अब , सज्जित है संगठित ,
यूथपति -सेनाधिप , प्रस्थान को चाहते.
अंगद-ऋषभ यहाँ ,  हनुमान -  वेगदर्शी 
गंधमादन - सुषेण ,  दर्शन  को  चाहते.
दो-दो हाथ रावण से , तत्पर हैं करने को  .
                          सेनापति  नील  अत्र , शुभाशीष चाहते.


सज्जन-सरल जन , आगत विरोध  चिंत ,
                          कार्य की प्रणाली में , डूबे चले जाते हैं.
संवाद को सुन कर , चिंता मग्न हुए राम ,
                          वदन गंभीर हुआ , भाव आते-जाते हैं.
आरोहित भाव हो के , पतन को चले जाते ,
                          जैसे घन…
नद-श्रोत सम यूथ , बढ़ते बढाते हुए ,
                      कपिराज समक्ष हो , मिलते मिलाते हैं .
कपि-ऋक्ष मिल कर , संत्रास को कहते हैं,
                      कैसे निशाचर शिशु , खाते हैं खिलाते हैं.
वनवासी वृन्द सब , आतंक को कहते हैं ,
                      कैसे  रक्ष - तंत्र  उन्हें , दलते  दलाते  हैं.
लूट लिया मार दिया, दलन - दमन किया,
                      शोषक  पे  दोष  वहाँ , लगते  लगाते  हैं.


कपि-ऋक्ष-वनवासी , एकत्रित होते गये ,
                      मानो कोई ताल वहाँ , बढ़ा चला जाता है.
पीत कपि अगणित , हिलतेसुदूर तक ,
                      जैसे कोई धानी क्षेत्र , झूम-झूम जाता है.
श्याम ऋक्ष भीम काय , गरज के लरजता ,
                      मानो  घन  मंडल  ही , गर्जन  मचाता है.
शत कोटि वनवासी , लय सह झूमते हैं,
                      जलधि  में  वायु जैसे  , तरंग  उठाता  है. 


अतुलित सैन्य-दल , जाम्बवंत देख कर ,
                       सुग्रीव समीप जा के , निवेदन करते .
कपिराज आदेश से , यूथपति पहुंचे हैं ,
अब अग्र आदेश की , प्रार्थना वे करते.
कपि-ऋक्ष वृन्द सह , वनवासी पहुंचे हैं ,
                       राम …
कपि कह नत हुए , राम के श्री चरणों में,                  राम अंतर हिलता  ,थर-थर कर के . कंज नेत्र आद्र हुए , कोर भरे अश्रु जल,                  मानो ज्वार वारि खींचे , हर-हर कर के. राघव नरसिंह  ने , खींच लिया एक सर ,                  मानो फणि निकला हो , सर-सर कर के . सुघ्रीव को कहते हैं , चल पड़ो लंक ओर ,                  कहते हैं मानो कोप , भर-भर कर के.


सुग्रीव  प्रणाम कर  , रामाज्ञा स्वीकार  कर ,                   जाम्बवंत को कहते, ध्वज फहराइये . अंगद को कह कर  , आदेश अंकन कर                   यूथपति स्मर कर , दल बुलवाइये . चर भेज - भेज कर , पथ सब  हेर कर ,                  अरि के प्रबंध सब  , ठीक जान जाइये.  हनुमान अग्र कर , सैन्य संगठन कर ,                  साधन को साध कर , कूच कर जाइये .  


हर दिशा गूँज गयी , नगाड़ों की थाप पर ,                   शाखामृग बढ़ गये ,  कपिराज दुर्ग को. शाखा-शाखा चलते हैं , कूदते हैं धावते हैं ,                  उठा लिया सर पर ,  हुंकारी से वन को . भीम काय ऋक्ष वीर , गरज-गरज कर ,                  गुहा से निकल कर , ठोकते हैं ताल को. सीधे-सादे वनवासी , ढोल पीट-पीट कर  ,        …
द्वार खोल-खोल कर, साँसे थाम-थाम कर ,                 बाट जोह- जोह कर ,मन  को  मसोसती .
राम -चित्र रच  कर ,पुष्प-पत्ती जड़ कर  ,
                खूब सोच - सोच  कर ,राम को पुकारती . सीता दिन-दिन भर ,भूखी-प्यासी रह कर ,                 रोती  राम - राम  कर , अंगुली मरोड़ती.
रावण  की बगिया में,अबला अकेली हूँ जी  ,
                कह - कह राम जी को ,सर को वो फोड़ती.


कपि कुछ  क्षण रुक , हस्त द्वय बाँध कहे ,
                 प्रभु जहाँ प्रमाद हो , मुझे क्षमा कीजिए .
अतल में कैद हुई , देवराज इन्द्र श्री ,
                 आप से ही मुक्त हुई , यश दृढ़ कीजिए . इन्द्र पुत्र काक बन , सीता-वक्ष  नोच दिया ,                  अक्ष फोड़ दंड दिया , राम याद कीजिए .
मर्यादा को भ्रष्ट कर , रावण तो हर कर , 
                  जानकी के प्राण लेगा , प्रभु कुछ कीजिए .

सीता तत्र  आशा लिये , जैसे-तैसे जीती है,
                    लक्ष्मण सुघ्रीव सह ,राम लंका आयेंगे. वर वीर वानर व , ऋक्ष यूथ  लेकर के ,                     वनवासी सैन्य दल , राम लिये आयेंगे. राम चाप थाम कर  , सायक को साध कर,                     दशानन -तंत्र पूर्ण , ध्वस…
प्रभु ! सीता उद्धार को , धरा सह चाहती है,                    सीता-राम की तरह , लोक भी संत्रस्त है.  स्वत्व जैसे राघव का , रुद्ध किया रावण ने ,                    प्रभु वैसे धरा का भी , हर लिया स्वत्व है. स्वेच्छाचार-कदाचार , प्रोत्साहित रावण से ,                    देव - नर - नाग  सब , रावण  से  त्रस्त हैं. शोषण व अत्याचार , रक्ष-तंत्र मूल में है,                    राघव ! विध्वंस तले , सर्व मूल्य ध्वस्त हैं.


देव - नर -नाग से ही , कारागार पूर्ण भरे ,                    निशाचरी तंत्र ने तो , सभ्यता जलाई है. अस्त्रागार - शस्त्रागार , यत्र - तत्र मिलते हैं ,                    धर्म  वहाँ  लुप्त  प्रभु , हिंसा  दिखलाई है. वधशाला-मधुशाला , लंका की है साज सज्जा ,                     तस्करी व उत्कोचन , कर्म ही प्रभावी है. कारागार भोगती हैं , सीता सम कई नारी  ,
                   कोई  भूली - भूली  हुई , कोई  पगलाई है.


राजीव से दूर हुई ,रावण की वाटिका में ,
               सीता सुध खोये बोले , मैं तो डूबी राम जी.
चिड़िया को चुग्गा देती ,पौधों को पानी देती ,
               भरमाई  सीता  कहे , यहाँ  देखो  राम जी. भोज…
कवि  योद्धा है,  कलम है अस्त्र ,  और- अर्थवान शब्द - विन्यास  है , कवि  योद्धा का , अमोघ शस्त्र .
इतिहास साक्षी है , इस योद्धा की गति से , जिसने , संवेदना के धरातल पर , लड़े हैं कई-कई युद्ध , मूल्यों के अस्तित्व के लिए .
योद्धा का श्रृंगार है . खुरदरा  और कठोर , और सजाता है ,
स्वयं को जिरह-बख्तर से,
आग्नेयास्त्रों से , कवि योद्धा भी रखता है - आग्नेयास्त्र जैसे पद-विन्यास , अनछुए विषय -शिल्प ,
और
जिरह-बख्तर सी अर्थवत्ता.

योद्धा की तरह देता है , निर्लिप्त भाव से , स्वशोणित आहूतियां  जैसे कोई ऋषि ,
पुनीत मंत्रोच्चार के सह  यजन-कर्म में देते  हैं ,
विश्व कल्याणार्थ  स्व उपार्जित 
पदार्थों की आहूतियां .


कलम उगलती है आग ,
तब , 
नहीं होता विध्वंस ,
बस होती है,
अनचाही झाड़ियों की ,
निर्मम कांट-छांट ,
और ,
स्थापित होती है ,
लहलहाती फसलें.


कवि की बोई फसलों पर ,
पलती है सभ्यता,
और पुष्ट होते है,
मानवीय मूल्य 
और स्थापित होता है-
कोई सुकृत.


कवि योद्धा है ,
नहीं है नीरो ,
जो कि  -
रोम के जलने पर भी,
तन्मय हो कर  ,
बजाये बांसुरी ,
बल्कि ,
इसके उलट दौड़ पड़ता है,
बुझाने को आग ,
क्योंकि-
वह जीता है,
संवेदना के धरातल पर ,
संवेदना के लिए .

हनुमान कथन से ,  राम गुरु गंभीर हो ,                कहते हैं वानर से , सीता हाल कहिये . आप मम हितकारी , सखा और सेवक भी ,                अभय  समझ  कर , हर बात कहिये . अतुलित बल युक्त , संकट मोचक रह ,                मम सह सुपूजित , वरदायी बनिये. सीता शोध सुकृत है , रक्ष-तंत्र विकृत है,                 अब सीता संवाद को , खुल कर कहिये.


तब हनुमान सादर , कंकण को सोंप कहे  ,                 प्रभु सीता सहिदानी , आप हेतु लाया हूँ  . कंकण को देख प्रभु , वक्ष पे लगाये कहे ,                   अरे सखा ! कंकण को , मैं खूब जानता हूँ .  अरे यह कंकण तो , वरमाल सह देखे ,                 कर-कंज भिन्न देख , त्रास ही तो पाता हूँ . सजल नयन हुए , कंठ रुद्ध होता जाता,                 प्रिये ! तुम्हे कष्ट में ही , सदा लिप्त पाता हूँ .


राघव को त्रस्त देख , लक्ष्मण उद्दीप्त हुए ,                 मुख रक्त रवि सम , तत्क्षण ही हो गया  . कर गहे वज्र धनु,  अवयव दृढ हुए , वर वीर व्याघ्र सम , क्रुद्ध वह हो गया. प्रभंजन अंतर में , उमड़ चला है पर ,                 राम अनुशासन में , स्वर रुद्ध हो गया. अनुज की प्रतिक्रिया , देख कहते हैं राम ,  …
हनुमान आगमन , प्रसरण शीघ्र हुआ ,                      मानो गंध प्रसरण , मंदिर में हो गया . जैसे-जैसे कपि मिले , आनंद - हिल्लोर बढ़े ,                      कपि का मिलन जैसे,उत्सव ही हो गया. कपि-वृन्द फल खाते , ऋक्ष-वृन्द मधु पीते ,                      जैसे कोई व्रत आज , पारायण हो गया. हर्ष - ध्वनि सुन कर , वन-प्रांत जाग गया ,                       मानो गीति काव्य का ही ,शुभारम्भ हो गया.


निशा अवसान सह , खग-कुल जाग करे ,                      प्रथम किरण सह , प्रकृति  रंजित है. मंद-मंद स्वर सम , कलरव चहुँ ओर,                      लगा जैसे साम गीत ,द्विज से स्वरित हैं . चल पड़े कपि राज , लेकर के हनुमान ,                      धीर-वीर सम द्वय , कुमार  शोभित हैं. राम-लक्ष्मण वंदन , सुघ्रीव कर कहते हैं ,                      प्रभु! आपकी कृपा से , वज्रांग फलित हैं .


श्रद्धाबुद्धि हनुमान , सविनय कहते हैं ,                     प्रभु के प्रभाव से ही , सीता मिल गयी हैं. यम-दिशा लंक-देश , रावण-राज यत्र है ,                     अशोक-वन-बंदिनी , जानकी हो गयी हैं .
भयकारी उपवन , निशाचरी तंत्र दृढ़ ,
                    राम…