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शिकार हो जाता फिर आदमी

रंग पैदा करते हैं भ्रम वे हमारे अनुमानों को हमेशा ही कर देते हैं खारिज जब कि काली-काली रेखाएं सत्य के बहुत आसपास खडा कर देती अनुमानों को देती है ठोस आधार जैसे गृहवधुओं की   आभाहीन देह और फटी हुई बिवाइयाँ बता देती है परिवार की दरकती स्थितियाँI
रंगों के व्यापारी   जब भी डूबा देते हैं आकंठ गाढे रंगों में तब कौन सोच पाता   अपने चारों और कसे आवरण के बारे में,   तब हर कोई तंद्रित सा हुआ डोलता है सपनों के झूले में,   फलस्वरूप फसल लहलहाती है झूठ की जिस पर लकदक बेलें छल और मक्कारी की    बुनती है घना डरावना जंगल, उस डरावने जंगल में रोज मारा जाता आदमी उसका ही तो करना होता है शिकारI