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Showing posts from January, 2012
सुग्रीव संतुष्ट हो के , सभासद को कहते ,                     सीता शोध योजना में ,शीघ्र लगना होगा. लोक की व्यथा से राम , भली भांति विज्ञ अत्र ,                     सैन्य-संघठन अभी , शीघ्र करना  होगा. अन्नागार -शस्त्रागार , पूर्ण करें आप अब ,                     साधन - वाहन हमें , शीघ्र  साधना होगा. दिशा-दशा देश-काल , चाहे कोई कैसा भी हो ?                     मित्रों ! रामाज्ञानुसार , शीघ्र बढ़ना होगा.


चिंतामग्न हो कर के , सभासद  चल दिये ,
                     डग  मग  नापते हैं  , मन निर्विकल्प है .
हनुमान आये नहीं , चिन्तना अनेक होती ,
                     अग्र गामी कैसे होगा ,शेष जो प्रकल्प है.
सीता शोध हो गया है , प्रतिष्ठा का प्रश्न अब ,
                     सीता मात्र हल होगा , किया जो संकल्प है.
तभी चर मिल कर , कपि आगमन कहे ,
                      हर्ष सह दौड़ गये ,  यही तो विकल्प है. 
सागर को पार कर , श्रृंग पे उतर कर ,                    किलकारी कपि कर , हुंकारी को करता.
हनुमान किलकारी , सुन कर वीर-वृन्द ,
                   सीता शोध मान कर ,उल्लास वो भरता.
राज राजा सुग्रीव जो , सुनते हैं कपि आया,
  …
सुग्रीव टहलते हैं , चिंतातुर होकर के , ध्रूम ज्वाल उगलती ,यम - दिशा उग्र है    हनुमान गये हुए , पक्ष पूर्ण रीत गया,                 लौट कर आये नहीं , राम भी तो व्यग्र हैं . प्रतीक्षा रत रहना , अति कष्टकारी हुआ,                राम से क्या बोलूँ अब ? प्रश्न ही तो वक्र है. सुग्रीव ने सभासद , शीघ्र ही बुला लिये ,                 सभासद भागे आये , राजाज्ञा तो अग्र है.


सभासद जुटते ही , प्रश्न किया सुग्रीव ने,                सीता शोध की प्रगति , मित्रवर कहिए . हनुमान भेज कर , आप सब सो गये हैं ,                सीता शोध शपथ की , गति अब कहिए. राज अतिथि हैं राम , अपने ही तंत्र में ,                 आतिथेय रूप में ही , सीता उन्हें चाहिए. मैने पाये वर वीर , राम-लक्ष्मण भ्राता को ,                 हस्त द्वय भर-भर , मित्रता ही चाहिए. 


तत्र वृद्ध सभासद , मिल कर कहते हैं ,                  स्वामी यह आप द्वारा , व्यग्रता उचित है. आप द्वारा जागरण , व्यर्थ नहीं जाएगा , सीता शोध योजना तो , पूर्व से रचित है . मात्र एक पक्ष हेतु , हनुमान भेजे गये ,                   हनुमान  आते  होंगे , उत्तम  पठित  है . यम दिशा व्यग्र हुई , ठोस …
राघवअनुज कर , ग्रह कर कहते हैं ,                       सखा आप सुग्रीव को , बूझ नहीं पाये हो .
जिस त्रास में हैं हम , कपिराज भोग चुके , 
                      व्रण उनके गंभीर , देख नहीं पाये हो .
वे तो राजराजा यहाँ , दायित्व गंभीर यहाँ ,
                      नव तंत्र होने से ही , मिल नहीं  पाये हों .
हम हैं अतिथि यहाँ , सादर व्यवस्था दी है ,
                      सीता शोध को लेकर , सो ही नहीं पाये हों . 


अश्रु ले अनुज कहे   , क्षमा करें लक्ष्मण को ,  राम सम अन्य नहीं , राम  सम  राम हैं . राम आप अगाध हैं , थाह नहीं मिलती है,                         लक्ष्मण की पाठशाला , पाठ अभिराम हैं. उद्धत स्वभावगत , आप सम धीर नहीं , लक्ष्मण तो दौड़-धूप , आप तो विश्राम हैं. प्रभु ! सीता शोध हेतु , श्लथ भाव खलता है,                         सीता कैसे जी पाएगी ? सीताप्राण राम हैं.


अनुज यह कह के , रामपद ग्रहते हैं ,                          राम उन्हें रोकते हैं , ऐसा नहीं कीजिए . लक्ष्मण आप भ्राता हैं , सखा भी हैं भरत सम ,                          संकट  में  सहभागी , उर  लग  जाइए . ऋणी हम आपके हैं , करणीय बताते हैं ,         …
गहन निशा में राम , गगन निहारते हैं ,                     टिमटिमाते नक्षत्र , उनको चिढाते हैं . तिर्यक मयंक देख , वाम भुज देखते हैं ,                      रिक्त उसे पा कर के , आह भर जाते हैं . आह सुनता अनुज , उठ कर बैठ जाए ,                      अनुज से राम कहे , कपि नहीं आये हैं. नित भू भ्रमण करे , आते-जाते रवि-चन्द्र ,                       पर सखा सुसंदेश , काहे नहीं आते हैं ?


निर्मल चन्द्र ज्योत्सना , छाई हुई चहुँ ओर ,                       मानो धरा मढ़ दी हो , स्वर्ण पत्र आभ से. शुचि जल श्रोत बह , झर-झर नाद करे ,                       मानो वीणा वादन का , प्रेम भरा राग है . मंद-मंद वायु बहे , पत्र ताल देते जाते ,                       शाखा झूम जाती मानो , रस पगा नाच है. राम यह देख कर , अनुज से कहते हैं , सीता किस हाल होगी ? यही अनुताप है.


राघव को खिन्न देख , कहते हैं लक्ष्मण भी ,                    कपिराज सुग्रीव को , निश्चिन्त ही मानिए. हनुमान भेज कर , सौर तान सो गये हैं ,                    हम  हुए  विस्मृत  हैं , कृतघ्न  ही  मानिए. राज-पाट लेने हेतु , मित्र-रूप धर आये , राज - पाट ले  कर के , विमुख  ह…
वानर सन्देश ले के , कहता विनत हो के ,                   सुनो  महतारी  आप , प्रकृति  स्वरूपा हैं . राम सह लोक खड़ा , मुक्ति को वो चाहता, सीता मात्र नारी नहीं ,सीता मुक्ति रूपा हैं. शोषण-दमन और , दुराचरण-ध्वंश में,                   विश्व वंदनीया सीता , शुचि शक्ति  रूपा हैं. आप के उद्धार सह , लोक का उद्धार तय ,                   अब आज्ञा चाहता हूँ , आप  धृति  रूपा हैं.


सजल वो नेत्र लिये , वानर को कहती है ,
                  समझ में आता नहीं , स्वजन क्यों जाता है? गमन उचित वत्स , मुझ को प्रतीक्षा होगी,
                  कहते  ही  जानकी  का ,कंठ  रुक  जाता है.
वानर ने अब देखा , सीता वर मुद्रा लिये ,                   विनत  वो  होकर  के , श्रृंग  चढ़  जाता है. घोर गर्जन कर , नभचारी होता है ,                   मानो  सुतपि  के   प्राण , नभ चढ़ा जाता है.
कंकण प्रदान कर , कहने लगी जानकी,
                  वत्स स्वामी से कहना , सीता मरी जाती है.
जैसे कर सिक्ता धरी , धीरे से खिसकती है ,
                  वैसी ही है प्राण - दशा , अब  श्वाँस  जाती है.
अब न विलम्ब करो , तन जर्जर हुआ ,
                   पक्ष  सब  विलग  हैं ,  हंसी  उड़ी  जाती  है .
आशा के ही बल पर , प्रतिदिन लड़ती हूँ ,
                   निगोड़ी ये मृत्यु मुझे , खींचे चली जाती है. 


राघव से दूर हो के , रोमावली त्रास भरा ,                  जल से विलग हुई , मीन सम जीती हूँ. दृष्टि मात्र राम को ही , खोजती ही रहती है ,                  मरुस्थल में बावरी , मृगी सम जीती हूँ. राम से बिछुड़ कर , मिली मानो रजनी ,                  राम -राम रटती , चकोरी सम जीती हूँ . वत्स प्रिय को बताना , जाने को आतुर श्वाँस ,
                 अविलम्ब राम देखूं , इसी आस जीती हूँ .


वत्स प्रिय को बताना , सीता सम धरा त्रस्त ,                   सीता सह धरा के भी , उद्धार को आइये. शोषण - दुराचरण , प्रसरित है लंका से ,                   विश्व अति शोषित है ,शमन को आइये. अस्त्र-शस्त्र रचना से , आतंकित विश्व है,                   …
दाह की प्रचंडता में , फंसे  हुए निशाचर ,                     बगलें ही  झाँक कर , सित्कारी वो  भरते .
जातुधान रमणियाँ , रावण को कोसती हैं ,
                    कपि अरि सदन देख , चिंगारी को भरते .
अस्त्र-शस्त्र शाला मानी , विश्व हेतु विध्वंसक  ,
                    भस्मीभूत  कर  कपि , किलकारी  करते .
मधुशाला - वधशाला , लज्जा के ही हेतु मान ,
                    छिन्न-भिन्न कर कपि , हुंकारी को करते .


जुलस-जुलस कर , दुर्ग खेह होता जाता ,
                    ज्वाल का प्रचंड रूप , नभ चला जाता है.
गजशाला - अश्वशाला ,  रिक्त सब होती जाती ,
                    अघ घट अब मानो , फूटा चला जाता है.
महाकाय हनुमान , चढ़ बैठे  श्रृंग पर ,                     दश दिशा चंड ज्वाल , बढ़ा चला जाता है. वारिधि में कूद कर , जल मथ डाला सारा ,
                    मानो ताप सरिता में , डूबा चला जाता है.


मन जब स्वस्थ हुआ , निकले वो वारिधि से ,                     ज्यों वारिधि मंथन से , सुधा घट निकला. तट से निकल कर , वन ओर बढ़ चले,                      मानो  घन - मंडल  में , सुधाकर  बढ़ता. जानकी से मिलते हैं , सहिदानी माँगते हैं,       …
कपि शीघ्र चढ़ कर , मंदिर के शीर्ष बैठा ,
                        धू - धू कर वस्त्र - ढेर , धधक के जलता .
अनल की ज्वाल पा के , अनिल चंचल हुआ ,
                        पुच्छ जली या ना जली , पर दुर्ग दहता .
अनल को क्रुद्ध देख , जातुधान भाग चले ,
                        सब ओर "त्राहि-त्राहि ",मात्र स्वर भरता .
मंदिर से मंदिर को , चला जाता वानर है ,
                        अनल और धूम्र से ही ,लंका नगरी भरता.


अब कपि रोद्र रूप , जहाँ-तहाँ दिखता,
                        अनल  लगाता चले , राम जयघोष में .
पदाघात कर-कर ,सदन ढहाता जाए,
                        कुंजर  प्रवेश करे , मानों कंज-कोष में .
छिप जाते लंकवासी , देख-देख हनुमान ,
                        छिपते हैं लवा मानो ,द्विजराज-कोप में.
जातुधान मारे जाते , वानर-हुंकार से ,
                        मरते  शशक  मानो , केसरी के घोष में .


जातुधान रमणियाँ , भयभीत बिलखती , 
                        हाय !मैया करती वो , अश्रु ढुलकाती हैं .
भयंकर ज्वाल देख , भैरव रूप कपि देख ,
                        ओह !तात कहती वो,संज्ञा-हीन होती हैं .
भीषण विस्फोट होते , सदन…
चिन्तते हैं कपि श्री भी , कैसा रक्ष समाज है ?
                    यन्त्र सम चल पड़ा ,बिना ही  विवेकके .
बुद्धि कहीं बेच दी है , मन कहीं मार दिया ,
                     हो गये हैं सहयोगी  , मूल्यों के पतन में .
अंध राजा श्रुति हीन , वैसी ही प्रजा भी है ,
                     शीघ्र दोनों हव्य होंगे , काल के ही यज्ञ में.
प्रभु कार्य सिद्धि हेतु , लौटना जरूरी होगा ,
                     चलो अब लग जाऊँ , पुच्छ के विकास में .


कपि ध्यान साध कर , सर्पिणी जगाते तत्र ,
                     प्राण ऊर्ध्व मुख हो के , गरिमा वो पाते हैं .
देखा जब वानर को , भीमकाय हो रहां है ,
                     जातुधान  कपि - रूप , देख  भय  खाते हैं.
सर्र-सर्र कर पुच्छ , शेषनाग सम होती ,
घृत - तेल  वस्त्र  अल्प , होते चले जाते हैं .
कपि अब देखते हैं , निशाचर श्रम मग्न ,
                     हाय - हाय करते वे , पुच्छ थामे जाते हैं.


कपि ठेल-ठेल कर , नगर घुमाया जाता ,
                     चौराहे पर रुद्ध कर , हास वो रचाते हैं .
निशाचर ढोल पीट , मृदंग को थाप मार , 
                     जातुधान अंगनायें , संग में नचाते हैं .
कोई पदाघात कर…
सोचते हैं हनुमान , अद्य प्रभु सहायक ,
                उचित समय मित्र , विभीषण आये हैं .
हटबुद्धि रावण जो , सुनता किसी की नहीं ,
                अनुज कथन माना , शारदा सहाये हैं .
शारदा ने कर दिया , रावण को मतिभ्रम ,
                फलतः पुच्छ - दाह , उत्सव मनाये हैं.
शक्ति सह गणपति , हरि-हर साक्षी होंगे ,
                अष्ट - सिद्धिं गुरु रवि , सफल कराये हैं . 


लंका नगरी में अब , ढम-ढम ढोल बजे ,
                प्रचारक  कहते  हैं , अद्य  उत्सव  होगा .
राज्यादेश सब हेतु , सब ही पालन करें ,
                रक्ष-अरि की सवारी , दृश्य रुचिर होगा .
ले के आओ घृत-तेल , लीर-चीर वस्त्र को ,
राज अवकाश जानो , गुरु रंजन  होगा .
नगर में कपि फेर , पुच्छ-दाह पूर्ण होगा ,
                पुच्छ-दाह देख अरि , सदा विमुख होगा.


आदेश के सह रक्ष , जुट गए उत्सव में ,
                सदन  पहुँच  कर , सजते-सजाते  हैं .
घृत-तेल ले कर के , लीर-चीर वस्त्र ले के ,
                मधुशाला जा कर के,पीते हैं पिलाते हैं .
वधशाला पहुँचते , आमिष की प्रियता में ,
                पुच्छ-दाह उत्सव को ,सुनते-सुनाते हैं.
स्वर्ण दुर्ग पहुँच कर , वा…
स्वामी ! कपि मारे नहीं , यह राजदूत यहाँ ,
राजदूत का हनन , नहीं अनुकूल है. 
सुदंड ऐसा दीजिए , नित्य ही स्मरण करे ,
                          सर्व दिशा सध जाए,जो भी प्रतिकूल है.  
कपि काष्ठ -पुत्तलिका , संचालक राम है ,
                          कपि-स्वामी अत्र आये,नीति अनुरूप है.
विभीषण-मित्र बोले , प्रभु ! यह उचित है,
                          मुख्य अरि-बंधन की , रीति ही अनूप है.


साधुवाद विभीषण ,लंकेश का आप को है .
                           अंग-भंग उचित है ,और तो युक्ति नहीं .
कपि मात्र साधन है , लक्ष्य अब अन्य है ,
                          लंका - विचलन हेतु , मूल में कपि नहीं .
जब तक हस्तगत , राम नहीं होते हैं ,
                          तब तक विवाद से ,लंका की मुक्तिनहीं.
राम का ही नाम लेके, हमें धमकाता कपि .
                           न रहेगा बाँस ही तो , बंसी बजेगी  नहीं.


सुनो-सुनो विभीषण , कपि पुच्छ विलक्षण ,
                           वह्नि युक्त पुच्छ  करो, दौड़ा -दौड़ा जाएगा.
पुच्छ हीन कपि जब , व्यथा राम से कहेगा ,
                           कपि दशा देख राम , जला - भुना आएगा.
चलो सब मिल कर , कपि…
आप जैसे शासक से , उचित अपेक्षा यही ,
                        दंड जो भी देना चाहें , वानर  को   दीजिए .
निजता की  तुष्टि हेतु , अहंकार पुष्टि हेतु ,
शासन की थामी वल्गा,शीघ्र मुक्त मानिए .
श्रुति रुद्ध दृष्टि बद्ध , जहाँ तंत्र बनता है ,
                        वहाँ अंध  कूप  में  ही , मूल्य गये  जानिए .
मूल्यों की प्रतिष्ठा हेतु , राम दस्तक देते हैं ,
                         मूल्य हन्ता रक्ष - तंत्र , अब  नष्ट  मानिए .


सुनो-सुनो लंक-वासी , कपि अति बुद्धिमान ,
                         हमें मूल्य हन्ता कहे ,पालक तो राम है .
हमें स्वत्व हर्ता कहे,श्रुति-दृष्टि रुद्ध कहे,
श्रुति-दृष्टि से सम्पन्न,विचारक राम है .
सत्ता और शासन में , हमें भ्रष्ट मानता है ,
                         हम लोक विरोधी हैं ,नायक तो राम है .
दशग्रीव चीखता है, जातुधान ! मारो कपि,
                         हमें दास कहता है , मात्र राजा राम है .


रक्ष-वृन्द दौड़ पड़ा , रावण के बोलते ही,
                         मानो श्याम घन फैले , पवन प्रवाह से .
चहुँ ओर श्याम काय , मध्य स्वर्ण काय कपि ,
                         मंडराती मक्षिका ज्यों,सौरभ …
कोलाहल के मध्य में , कपि श्री गरजते हैं ,
                     स्वामी!आप का कथन,हितकर नहीं है.
विद्रोह -विरोध सदा , नहीं कुचले जाते हैं ,
                      अरिवृद्धि  नृप  करे , यशस्कर  नहीं है.
साम दाम राम हेतु , स्वामी ! व्यर्थ सिद्ध होंगे ,
                      श्री राम को न मानना, अर्थकर नहीं है.
ब्रह्मा हरि हर प्रभु , राम से इतर नहिं ,
                      इन में  भेद   करना , श्रेयष्कर  नहीं है.


कपि श्री के बोलते ही , नीरवता ही छा गई ,
                      रक्ष-वृन्द स्तब्ध हुआ,गाज जैसे  गिरती.
कहते हैं रावण को , मिला यह अवसर,
                      व्यर्थ नहिं करें आप , प्राण-धार मिलती.
प्रकृति स्वरूपा सीता , हर कर लाये आप,
                      पञ्च तत्त्व क्रुद्ध रहे , लंका  खूब हिलती .
श्री राम की शरण लें , सीता सौंप क्षमा मांगे , 
                      लंका को सुशासन दें , यही  राह बचती .


झुंझला कर लंकेश , कहता है वानर को,
                       जानता हूँ श्रेय मेरा ,जानता हूँ नीति को .
शासन और सत्ता की , वल्गा थामे रखता हूँ ,
                        चाहूँ जैसे चलते हैं , जानता हूँ रीति…
इसी स्वेच्छाचार तले , सीता का हरण हुआ ,
             सीता-राम दंपत्ति के ,स्वत्व का हनन जो .
जहाँ स्वत्व छीना जाता , विद्रोह पनपता है ,
             स्वत्व  हेतु  लोक  में , संघर्ष  चलन  जो .
फूटता विद्रोह जब , गुरुत्तर ध्वंस करे ,
मानो ध्वंस कर जाये , भारी भू कंपन जो.
वारिधि के उस पार , लोक सह राम खड़े ,
स्वत्व सौंप क्षमा मांगें , उचित अंकन जो.


कुलिश वचन सुन , कहता है दशग्रीव,
                     अरे कपि ! मम कृत , सदैव उचित है.
विद्रोह-विरोध सदा , बाधक रहे मार्ग में ,
                     साम-दाम साध लूंगा,नहिं अनुचित है.
हर सौंपे दश शीश , हर प्रति विनत हूँ,
                     मृत्युंजयी दशग्रीव , हर से रक्षित है.
कौन सीता कौन राम ? कैसा स्वत्व कहते हो? 
                     मात्र स्वत्व लंकेश का,सदैव रचित है.

यह कह दशग्रीव , अट्टहास करता है ,
                      ज्वालामुखी का विवर ,मानो फटा जाता है .
तीक्ष्ण दृष्टि डाल कर , मंदिर में भ्रमता है ,
                      धूमकेतु नभ-मध्य , मानो चला जाता है .
कोलाहल कर-कर , रक्ष-वृन्द पहुँचता ,
                      प्रभंजन  में  वारिधि , मानो  बहा जाता…