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Showing posts from April, 2012

संवाद के लिए , मुलाक़ात तो करें.

दूरक्योंखड़े , आओबाततोकरें.
संवादकेलिए , मुलाकाततोकरें.

सूनी - सूनीसांज,
उदासहैप्रभात ,
दिग्भ्रमितहैदिन ,
बर्फसी
प्रिय ! एक बात अब , कहूँ उसे मान जाओ ,
                        सीता सती स्वरूपा है , अबला न मानिए  .
हर लाये आप उसे , बिना ही विचार के ,
                        परदारा व्याली सम , काल रूप  जानिए .
सीता मात्र राघव की , राघव को सौंप कर ,
                         सादर- विनय सह  , क्षमा मांग जाइए .
दमन-दलन त्याग , मकार व राग त्याग ,
                          संत  भाव ला कर के , लोक राज  लाइए .
जिस देश का है नृप , विचलित-विलोड़ित ,
                     उस देश की प्रजा को , शांति कहाँ मिलती.
देख लिया ध्वंस काल , जिस देश की प्रजा ने ,
                     उस देश की प्रजा को , कृति  कहाँ मिलती .
देख लिया प्रतिकार ,  जिस देश की प्रजा ने ,
                     उस देश की प्रजा को , प्रीति कहाँ मिलती .
देख लिया प्राण भय ,जिस देश की प्रजा ने ,
                     उस देश की प्रजा को , सृष्टि  कहाँ मिलती .

जिस देश पर नहीं , दृष्टि का वरद हस्त ,
                      उस देश का स्वरूप , निश्चित ही खोना है.
जिस देश पर नहीं , रीती का वरद हस्त ,
                      उस देश का अभय , निश्चित ही बोना है.
जिस देश पर नहीं , नीति का वरद हस्त ,
                      उस देश का गठन ,  छिन्न-भिन्न होना है.
जिस देश पर नहीं , शांति का वरद हस्त ,                       वह देश  खंड - खंड , निश्चित ही होना है .

ऐसे देश का निवासी , खोया-खोया रहता है ,
                      प्रच्छन्न वह्नि चूड़ में , दहता ही रहता .
प्राण भय से ग्रसित , शंकित सदा ही रह ,
                      सुधा सम संबंधों में , गरल ही भरता .
मन भ्रमर सा भ्…
मंदोदरी विहार से  , लौट रही सदन में ,
                    खोया-खोया डूबा हुआ  , देखती है नृप को . चिंता-मग्न हो कर के , रावण गवाक्ष-पार्श्व                      अंतर टटोलता या , देखता नगर को . भर आये कंज नेत्र , उमड़ा ह्रदय घन ,                     भृत्य निर्गमन किये , रानी सजी पार्श्व को. कोमल संस्पर्श किया , वाणी-अभिषेक किया ,                     वैद्य देना चाहता ज्यों , पथ्य रुज ग्रस्त को.

प्रिय ! हम जानते हैं , सोच रहे वाहिनी को,
                   सीता हेतु राम आये , सीता सौंप दीजिए.
सीता शोध करने को , कपि सत्य सह आया,
                   तब सत्य चांप दिया , दंश आज  देखिए . राम लोक-वाहिनी ले, आगये हैं कूल पर ,
   सत्य तिस पर साथ , अजेय ही मानिए .
देख रहे प्रिय आप , देश भय-ग्रस्त हुआ ,
                   भय हितकारी नहीं , कारा मात्र  मानिए .


प्रिय आप अंतर की , हित  वाणी  सुनिए ,                     अंतर ने कह दिया  , सीता मुक्त कीजिए .
अंतर में उठ कर , सबल हो झंझावात,                     मानस को मथ दिया , सीता मुक्त कीजिए .
विचलित अंतर में , संदेह उपज कर 
                    विश्वास को क्षीण किया , स…
अंतर्मन में व्यथा बहुत है .

अंतर्मन में व्यथा बहुत है .
क्या बोलूँ मैं कथा बहुत है.


सोचा जिसको पढ़ा लिखा है,
अनपढ़ सा वो मुझे दिखा है .
अकड़ मार कर बना खजूरी ,
संस्कारों में  व्यर्थ दिखा है . संकीर्ण विचारों की गठड़ी में,
अपना ही आलाप  बहुत है.


खुद ने सोचा, खुद ने समझा,
वही प्रमुख और वही पूर्ण है ,
हमने सोचा और समझा जो ,
हुआ गौण और वह अपूर्ण है.
समझ - सोच को लेकर के ,
मतिभ्रम उनमें भरा बहुत है.


अभी चले हैं चार कदम बस ,
मंजिल उनकी बहुत दूर है .
सोच रहें हैं बहुत चल दिए , वे लगे थकन से चूर-चूर हैं .
अहं बोलता हरदम उन  पर,
पर्दा उन पर स्याह बहुत है.


क्या रिश्ता है क्या बंधन है,
अपरिचित की वे शैली जीते.
पैसा ही बस परम लक्ष्य है,
सरल प्रेम से तन - मन  रीते.
वे पेड़ कभी भी नहीं सींचते, पर रसाल की चाह बहुत है .


आदर्शों से अपरिचित हो कर,
हाय !कहाँ यह युग जाता है ?
कुंठा और हताशा ही जी कर,
हाय !कहाँ यह युग जाता है ?
विश्वासों की वे खान माँगते ,
शंकित मन की प्रथा बहुत है
नव गीत .
धूप - छाँव सी,  हमारी जिंदगी.
अभी से थक के क्या , बैठते हो यार . जीवन के साथी हो , लो जिंदगी संवार . दीया - बाती सी, हमारी जिंदगी.

साथ चलने की ,
शपथ खाई थी.
प्यार की वो लो ,
हम से जली थी.
जोड़ - तोड़ सी,
हमारी जिंदगी .

उदासियाँ कई ,
आ गई हैं यार.
जरा सी देर ठहर,
इन्हें दूं बुहार .
गुलाब - कांटें सी ,
हमारी जिंदगी .

ऊँच - नीच तो , चलता ही रहा है . ढलानों में प्यार , पलता ही रहा है . राह - मोड़ सी . हमारी जिंदगी.
श्री राम आगमन की सूचना पर रावण का विचलित होना-

राम का वाहिनी सह , आगमन सुनकर ,                      विचलित दशग्रीव , चिन्तना में डूबता.
सदन में यत्र -तत्र , भ्रमण वो करता है,
                     कभी जड़ हो कर के,शून्य में ही तकता,
विकृत आनन कर , नेत्र निमीलन कर ,
                     स्वगत भाषण कर , उच्छवास तजता.
भ्रमर में मानो कोई , जहाज उलझ कर ,
                      वर्तुल भ्रमण कर , दायें - बाएं झूलता.


झूलते जहाज पर , आरोहित जन-वृन्द ,                        विचलित होते जैसे , रावण को मानिए. यत्र-तत्र धावते हैं , त्राहि-त्राहि करते हैं ,                        प्राण भय ढोते जैसे , लंकेश को मानिए . किये अघ याद करे , मुक्ति मन्त्र जाप करे ,                        काल ग्रास होते जैसे,रामारि को मानिए . तृण  सम  जन को भी , सहायक मान कर ,                        लगाते पुकार जैसे , यज्ञारि को मानिए .


राज-राजा दशग्रीव , चिन्तना में धंस  चले ,                        मानो मृग शावक को , पंक खींच लेता है .  चिन्तना से शून्य कार्य , जड़ करता है अद्य ,                        सिंह देख शशक ज्यों , ठगा रह जाता  है . क…
श्री राम  का समुद्र तट पर सीता का स्मरण कर दुखी होना  और  रावण के प्रति प्रतिशोध प्रकट करना- 



प्रिय से मिलन हेतु , जैसे -जैसे राह कटे ,                   सदाशा में वृद्धि होती , प्रकृति प्रभाव है . पर मेरे सह कैसे , प्रकृति विरुद्ध होती ,                   मुझे मिले हताशा क्या,नेह परिणाम है.
सीता अति संकट में , यह जान मन मेरा ,
                  झूले सा यह झूलता , चंचल  स्वभाव है.
मन को भी साधता हूँ , वारिधि को बांधता हूँ ,
                  हाय ! सखा दहता हूँ , प्रतिशोध भाव है.


चाहता हूँ सखा मेरे , सीता ले-ले शक्ति रूप 
                  महिषासुर सम ही , रावण को मार  दे .
चाहता हूँ भाई मेरे , सीता ले प्रचंड रूप ,
                  चंड - मुंड सम ही वो , रावण को काट दे .
चाहता हूँ वीर  मेरे , सीता मम शिखी ले के ,                   शुम्भ सम रावण के , वक्ष को ही पाट दे .  चाहता हूँ लाल  मेरे , सीता सिंह वाहिनी हो ,                   निशुम्भ सा निशाचरी, तंत्र को उखाड़ दे .


राम का वदन तप , रवि सम रक्त हुआ ,
                  मानो क्रोध अनल में,स्वर्ण थाल तपता.
राम ओज रूप देख , हर्षित अनुज हुए ,
               …
क्षण 
सृजन का ,
एक क्षण  ,बहुत है ,
पूर्ण युग का,क्या करेंगें .
रोज चलना नियति बनी है , यायावरी सी यह जिन्दगी है . यह टूटती है ,यह बिखरती है . खिलौने सी मम जिन्दगी है .
अनुभूति का , एक क्षण  ,बहुत है , पूर्ण युग का,क्या करेंगे.
गढ़ रहा हूँ , मढ़ रहा हूँ , मृत्तिका सम  जिन्दगी है , कुम्हार सा मैं बन गया हूँ , घट सी यह मम  जिन्दगी है .
सत्य का , एक क्षण  ,बहुत है , पूर्ण युग का,क्या करेंगे. 
जोड़ -बाकी नित ही लगाता , गणित सी यह जिन्दगी है, कितनी उधारी शेष मुझ  पर , बही सी बनी मम  जिन्दगी है .

अभिव्यक्ति का , एक क्षण  ,बहुत है , पूर्ण युग का,क्या करेंगे.
पत्थरों के शहर में ,
बहुत समीप से ,
देखे हैं ,पत्थर .
जिसने भी चाहा,
जैसा भी चाहा,
वही रूप लेते ये पत्थर,
पत्थरों को फिर भी ,
कोसती है,
सम्पूर्ण  दुनिया ,
बेचारे ये पत्थर .


पत्थर ?
हाँ -हाँ ये पत्थर ,
कई-कई  रंग -रूप लिए ,
आकृति और प्रकृति लिए,
मोन - मूक रहे पत्थर ,
दबे - उखड़े पत्थर . 
खेतों की मेड पर ,
वीथियों और राजपथ पर ,
झोंपड़ियों और अट्टालिकाओं की ,
नींव में दबे- दबे ,सुबकते ,
या ,
कंगूरे बने पत्थर .


धन  कुबेरों  के कोष में 
 संगृहीत पत्थर  ,
सुंदरियों की,अँगुलियों में, 
तराशे हुए पत्थर ,
गणिकाओं की दृष्टि से ,
भरमाये पत्थर .
मंदिरों , मस्जिदों में जड़े ,
पञ्च सितारा होटलों के फर्श पर ,
प्रतिबिम्ब उकेरते पत्थर ,
शमशानों- कब्रगाहों पर ,
भयावह  सन्नाटों में दफन ,
ये भूतिया पत्थर ,
या,
देव मूर्तियों का रूप लिए ,
ये पूज्य -पवित्र पत्थर .


आप और हम भी ,
इन पत्थरों जैसे ही ,
जिसने जब  चाहा ,
जिस रूप में चाहा,
उस रूप में किया,
हमारा उपयोग ,
अपना-अपना उल्लू ,
सीधा किया ,
और ,
हमें कभी गंवई ,
कभी जाहिल ,
तो कभी निकम्मा मान ,
मात्र हमारा उपयोग किया ,
क्योंकि ,
हम भी पत्थरों की तरह ,
मोन - मूक रहे .


पत्थरों !
हम तुम्हारे दर्द को समझते हैं ,
क्…
तू-तू  मैं - मैं कर रहे , लिए अहं का जोर . अहं तुरत ही सोंपता, कागा जी का शोर .


बीच  नगर  में  बेठ के, चला प्रेम का दोर. लुटे पिटे घर को चले,नहीं रुदन अरु शोर.


कर-कर आलिंगन कहे,लाल  चलो घर ओर . चम - चम  करती बीजली,करे भयंकर शोर .


शोर नहीं हलचल नहीं , बन बेठे भरतार .
मैंने  नौका सोंप दी , मान लियो करतार .


उपवन गयी जु राधिका,लाल दियो झकझोर .
इत - उत देखत ही रही , केवल नन्द किशोर .


वो पिक को यूं डांटती,मत कर अब शठ  शोर .
मन पर मेरा बस नहीं ,नहीं घर पर चितचोर .


जन-धन-बाहु-बुद्धि बली , करते छल-अभिमान .
वे जन पग - पग लाजते , खोते नित  सम्मान .


जे नर ना ही जानते , चलन - कलन की बात .
वे तत्त्व पर लिखन  चले , कहूं मूरख की जात.


अज्ञानी  ज्योतिष  बने ,काठ - चर्म  के  ढोल .
बाहर  से  फूले  -  फले , अन्दर  पोलं  - पोल .


लग्न - चन्द्र होरा - दशा , गोचर का ना ज्ञान .
कह  नहीं  पाते  फलित , वे  पत्रा  के भगवान .
राह में सघन वन , कई - कईवृक्ष मिले ,
                   दिवस में तम का भी,कई बार राज है.
आम्र व अशोक वृक्ष , पीपल व पाकड़ हैं,
                   बरगद बबूल नीम , फलित अथाह है.
तीव्र नद धार मिले,विस्तृत तडाग मिले,
                  झरनों की झरन में , अवरुद्ध राह है.
ऊभ -चूभ मार्ग हो या, सरल हो मार्ग चाहे,
                  बढे-चले जाते सब , राजा राम साथ है.


वारिधि के तट पर , पहुंची शीघ्र वाहिनी ,
                  मानो चाहता है नद , उदधि मिलन को.
वर वीर फैल गए , यत्र तत्र तट पर ,
                  मानो  चाहते  मराल , मुक्ता के चयन को .
श्रम परिहार हेतु , स्नान करते हैं वीर ,
                  मानो  चाहते  हैं  देव , सागर मंथन को .
चंचल वारिधि देख , राम अति गंभीर हैं ,
मानो  चाहते  हैं अद्य , सागर लंघन  को .


राज हंस  देख कर  , राम अनुज से कहे ,
                  युगल को साथ देख , सीता याद आती है .
अग्र गामी हंस होता , अनुगामी हंसिनी है ,
                  हंसिनी को देख-देख , सीता याद आती है .
वारिधि तरंगों में है , डोलता युगल यह ,
                   राम का भी त्रास यही,सीता याद आती है.
इस कूल हम बैठे , उस कू…