Sunday, 29 December 2013

संबंध और सरोकार

जो सोये हैं, उनके पास नींद है ,
वे जिंदगी में अकेले हैं ,
या, उन को किसी से कोई ,
सरोकार नहीं
जैसे बर्फ का अकेले सोना
परंतु पानी का निरंतर जागना ।

संबंध और सरोकार
कभी चैन से
रहने ही नहीं देते ,
ये दोनों नित्य ही,
दिमाग में घंटियाँ बजाते रहते हैं
जैसे रेल पटरियाँ और स्टेशन। 

दिमाग में बजती घंटियाँ,
किसी खतरे को,
या,किसी अनहोनी को बताती है ,
ऐसी स्थिति में,
बजती हुई घण्टियों के आगे,
नींद नहीं टिका करती
जैसे दौड़ती व्याकुल नदी ।

जवान लड़की ,
जिसे अभी खिलखिलाना है,
किसी गुलाब की मानिंद,
वह अपने ही शोहर की ,
बदमिजाजियों की वजह से रोती है
जैसे झर रहा हो नर्म झरना। 

पिता का संबंध
अपनी जवान बेटी से है ,
और बेटी की जिंदगी से,
उसे सीधा सरोकार है,
अब भला संबंध और सरोकार के रहते ,
नींद आए तो आए कैसे?
जैसे बहती हवा में दीपक का लड़खड़ाना ।  


-त्रिलोकी मोहन पुरोहित राजसमंद। 

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