Friday, 21 March 2014

अपनी मिट्टी से

चाहता हूँ मिलूँ अपनी मिट्टी से।
कई रंग मिलते अपनी मिट्टी से॥

रंज और गम क्यों रखूँ अपनों से।
एक रिश्ता भी है अपनी मिट्टी से॥

बुरा भी भला ही लगा है हरबार ।
जो कोई जन्मा अपनी मिट्टी से॥

खूँ अचानक उबाल मार जाता है।
चीखेँ जो आई अपनी मिट्टी से॥

आग बरसी थी वो जुलसाती रही ।
राहतें तब आई अपनी मिट्टी से॥

घुटन और बन्दिशें भी हैं अब कहाँ।
मुझको पंख मिले अपनी मिट्टी से।।

उड़ान भरनी होगी आसमान तक।
हाथ मिलाने को अपनी मिट्टी से।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित राजसमंद।

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