Saturday, 31 March 2012

प्रयाण गीत गान से , वर वीर वाहिनी के ,
                  क्षिप्रता से बढ़े जैसे , दावानल बढ़ते .
कपि-वृन्द उत्साह से, कूर्दन-धावन करे ,
                  विटप उखड़ते हैं , भूधर भी धंसते .
बढ़ते विराट ऋक्ष , वक्ष पीट-पीट कर ,
                  पुष्ट गात्र घर्षण से , शैल भी लुढ़कते .
भोले-भाले वनवासी , राम सह मोद भरे,
                  राम-लक्ष्मण-सुग्रीव ,उत्साह से भरते.


आगे बढ़ एक वीर , देखता है राह शुद्ध ,
                तब वह शेष वृन्द , बुलाता-बढाता है .
वृन्द एक पहुँच के, अन्य को बुलाता है,
               अग्र गामी होने हेतु ,देखता-दिखाता है.
वनवासी वृंद दोड़, श्लथ वीर संभालते,
               परिचर्या - उपचार , करता-कराता है .
राम जय घोष लगा , वाहिनी सतत चले ,
               वर वीर ओज भर , जुड़ता-जुड़ाता है.
निर्बल समझ कर , जब धूलि रोंदी जाती ,
                चरण से चाँपी धूलि , मौलि चढ़ जाती है .
सुरभि सरल जान , पुच्छ जब ऐठीं जाती,
                सुरभि सरल तब , श्रृंग लिए आती है.
लोक को सहज जान,जब गति रोकी जाती , 
                बन के प्रलय रूप , ध्वंस कर जाती है .
सीता हर रावण ने , काल को ही न्योत दिया ,
                काल रूप वाहिनी जो,लंका चली जाती है.

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