Sunday, 7 July 2013

बंद कमरों में .

बंद कमरों में कभी ,
तस्वीर बदली है ,
बदलना चाहते हो ,
वर्तमान की मुद्राओं को ,
ज़रा बाहर आ कर ,
पूरे दम के साथ ,
एक लम्बी ,
सांस भर कर देखो ,
हवा में कितनी नमी ,
कितनी गिर्दी या ,
कितनी गर्मी भरी हुई है ,
तब कहीं जाकर ,
तस्वीर बदलेगी .

ज़रा मिट्टी की ,
सुनना सिसकियाँ ,
जो बंद कमरों में ,
तुम्हारे ,
मानसिक विलास की ,
लिजलिजी दुर्गन्ध की ,
घुटन से फूट जाती हैं .
यही मिट्टी ,
जब भी मरती ,
कितने ही मानसिक विलासी ,
इस में क्षार होते हैं .

जब बंद कमरों में ,
बदलाव की बातें ,
करी जाती ,
जैसे अभी ही उत्सर्ग होगा
और ,
बंद कमरों की दीवारें ,
साक्ष्य बनकर प्रेरणा देगी ,
परन्तु ,
बंद कमरों में फूटे ,
असंतोष के स्वर ,
पुरस्कारों की होड़ में ,
कतारबद्ध देखे जाते ,
तब ,
क्षोभ से भर जाती हैं ,
छातियों से रिसती ,
पसीने की श्वेत धाराएं .
हाय ! ऐसा संघर्ष का ,
बौना रूप भी होगा ,
जिसे देख कर आँखें ,
धरती में गड़ी जाती .


त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द ( राज.) 

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