वह बचपन मेरा

मैंने बचपन को फैलाया
कागज पर ,
रंग फैले या मैं फैला
कागज पर ,
हाथों से फिसल गया
रेत घड़ी सा
वह बचपन मेरा ।

बिना किसी की लाग लपेट
जो अंदर था
वो बाहर आया ।
नीला-पीला या श्वेत-श्याम था
जैसा भी था
वो आया ही आया।
संत सरीखा,
वह बचपन मेरा ॥

रंगो की कब कहाँ प्रतीक्षा
जो मिट्टी थी
वो भी रंग होता।
पानी रंग सा रंग पानी सा
हाथ लगा पंक चाहे
वो रंगों का राजा होता ।
भूला-भटका,
वह बचपन मेरा।।

सब की जात-पाँत अपनी ही
जैसे तीर्थाटन में
सब अपना होता।
इसका खाया उसका पीया
बचपन भला कहाँ मानता
सब अपना होता।
द्वन्द्वो से खाली
वह बचपन मेरा॥

लो होली पर खोज रहा हूँ
विगत दिनो की
ले-ले रोकड़ बहियाँ।
अपने वातायन देख रहा हूँ
वे रंग भरी
परिचित गलियाँ।
फिर कैसे लौटाऊँ
वह बचपन मेरा॥

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

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