दाएं से बाएं

बल खा कर वे निकल गए हैं
दाएं से बाएं।
मानो निकला अभी अजूबा
दाएं से बाएं।।
कुछ नादान चिल्लाते आए
दाएं से बाएं।
एक सुनहरा अवसर खोया
दाएं से बाएं।।
हो हल्ले में भीड़ बढ़ गई
दाएं से बाएं।
अंधों के हाथ लगी बटेरें
दाएं से बाएं।।
सब पूछ रहे मकसद अपना
दाएं से बाएं।।
गगन ताकते गिरे कूप में
दाएं से बाएं।।
भीगी पानी पीकर ईंटें
दाएं से बाएं।
अब दीवार में लगती ईंटें
दाएं से बाएं।।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

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