मौन की दीवार


मौन की दीवार के रहते
एक यशोधरा को
जीवंत करता है,
दूसरा, उपलब्धियों की
मरी कामनाओं को 
पूर्ण करने के लिए,
बोधिसत्व को
शहर के व्यस्त पथ पर
निरंतर खोजता रहता।
आँखें अब भी
अभिसारण करने को
नहीं चूका करती,
शब्द का निर्झर
मौन की दीवार को
बहा ले जाने को
व्याकुल हो कर भी
सरस्वती की धार सा
छिपा जाता।
दुरभिसंधियाँ.............
दिये हुए गुलाबों की,
तह कर संभाली हुई
जीर्ण-शीर्ण चिट्ठियों की
भला कहाँ सुनती।
-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज)

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