Tuesday, 2 April 2013

कल सवेरा जान कर मैं जी गया



एक प्याला पी गया जो पी गया
बस तेरा मैं नाम ले के जी गया

हर बार मुश्किलें तो आती रही
मुश्किलों को नाम तेरे जी गया

जख्म साकी दे गया तो दे गया
और पीड़ा नाम उस के जी गया

द्वार जो भी खुला वो रोता मिला .
दूसरों  को चुप  कराते जी गया .

पुष्टजन में कायदे मरियल मिले .
कायदों से रिक्त जग में जी गया .

कतरन लिये पेहरन बुनता रहा .
कतरनों को ओढ़ कर मैं जी गया .

होगी कोई वह इंद्रधनुषी जिंदगी .
जैसे-तैसे ये जिंदगी तो जी गया .

उस को दुआ दूं कि अब दूं बद्दुआ .
देख लो बदहाली में भी जी गया .

मुश्किलें अब उन की  ही बढ़ रही .
मैं तो वो नेमत समझ के जी गया .

उन को  जरूरी  हो  गया जानना .
उन से लगी आग कैसे जी गया ?

कर्म सारे करने थे वह  कर गये .
कल सवेरा जान कर मैं जी गया .

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

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