Monday, 22 April 2013

विवश हो कर , रह गया है - शीर्ष अपना .


विवश हो कर , रह गया है
शीर्ष अपना .
घने कुहासे में ,फँस गया है
शीर्ष अपना .

नित्य रजनी की विदाई ,
हम कर रहे हैं .
नित्य दिन की वंदना भी ,
हम कर रहे हैं .
एक से ही दिवस आते ,
एक सी ही रातें बीत जाती .
परिवर्तनों के नाम पर ,सो रहा है
शीर्ष अपना .
विवश हो कर , रह गया है ,
शीर्ष अपना .

दिवस लाचारी में ढला जो ,
बस चीखता है .
रात में भय सना साया ही,
बस दीखता है .
विवश सी यह जिंदगी ,
भय से भरी ही बीत जाती .
संस्कृति के नाम पर ,खो रहा है ,
शीर्ष अपना .
विवश हो कर , रह गया है
शीर्ष अपना .

दुराचरण ही रिस रहा है ,
धमनियों से .
बस कालिख ही पुत रही है ,
चिमनियों से .
त्रासदी के सिल पर पड़ी ही ,
साँसे दम तोड़ जाती .
आचरण के नाम पर , सिर धुन रहा है ,
शीर्ष अपना.
विवश हो कर , रह गया है
शीर्ष अपना .


शुभ कृति ही मांगती है ,
बस सुकोमल जिंदगी .
फिर से कुछ ऐसा नया हो ,
खिले अंकुरित जिंदगी .
आशाओं को लिए धारा ,
दर्द पीछे छोड़ जाती .
सुकृति के नाम पर , अंक लिखता है ,
शीर्ष अपना .
विवश हो कर , रह गया है
शीर्ष अपना .

जब भी जागें होता सवेरा ,
जाग भी जाएँ सभी .
घायल चरण ही पंथ देते ,
पंथ गढ़ जाएँ सभी .
किसी गुडिया सी जिंदगी ,
करुण स्वर से पुकार जाती .
नवीनता के नाम पर , पुकारता है ,
शीर्ष अपना .
विवश हो कर , रह गया है
शीर्ष अपना .


- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द

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