Wednesday, 31 August 2011

जीवन एक उत्सव है ,जीवन है सामगान

जीवन एक उत्सव है , जीवन है सामगान  ,
 शिक्षा  उत्सव है, सुगंध है,
जिसे पाकर आदमी ,
पुनः - पुनः जीवित ,हो उठता है ,
जैसे थका - थका पथिक ,
तरोताजा सुमन - गंध पाकर,
या  -
मिट्टी की सोंधी महक पाकर ,
फिर -फिर बढ़ा लेता है जीजिविषा,
पढ़ना - लिखना मूल्यों के लिए ,
न कि मूल्यों के हनन के लिए ,
फिर एक बात बताओ मित्र -
बारूद से तुम्हारा रिश्ता क्यों है ?
तुम कुछ कहने से पहले सुनलो -
जीवन एक उत्सव है , जीवन है सामगान.

विज्ञान शीतल छाया है,
जिसे पाकर आदमी,
तपिष से बचता है,
जैसे - मरुस्थल में भटका - भूला जन ,
थोडी सी छाया पाकर ,
फिर से मरुस्थल से ,
लड़ने के लिए हो जाता है तैयार ,
 और-
मरुस्थल को बागवां में,
बदलने के लिए हो जाता है तत्पर ,
न कि , मरुस्थल को लहलहाने देता है ,
भयानक काल के लिए,
फिर एक बात  बतादो मेरे कान में-
आखिर आग्नेयास्त्रों से तुम्हारा रिश्ता क्यों है ?
 तुम कुछ कहने से पहले सुनलो -
जीवन एक उत्सव है , जीवन है सामगान.

साधन है शरबत की लुठिया,
जिसे पाकर हो जाता है आदमी,
रसमय ,
मानो रूखे-सूखे जीवन में ,
किसी ने गोल दी हो,
संबंधों की शक्कर ,
उस मिठास को पाकर ,
जीने के लिए सजा लेता है- महापर्व,
साधन षड्यंत्रों के लिए नहीं ,
अपितु ,
जीवन में सप्तस्वर सजाने के लिए,
फिर एक बात तो बतादो धीरे से -
मृत्यु के उत्स से तेरा रिश्ता क्यों ?
तुम कुछ कहने से पहले सुनलो -
जीवन एक उत्सव है , जीवन है सामगान .

धर्म है खरा स्वर्ण ,
वह सब जगह है एक सा ,
जैसे हवा- पानी ,
चढ़ा दिया हमने,
उस पर आवरण ,
जिससे दिखाई देता है,
अलग-अलग ,
यह आवरण ही छिपाता है-
 स्वर्ण -सत्य को ,
देता है हमें धोका ,
और-
 मान बैठते है-धर्म ,
अपना- अपना  अलग -थलग ,
चलो अब मिलकर हटायें विभ्रम ,
और स्थापित करें स्वर्णिम  सत्य ,
गरज  यह कि विध्वंस का हो समापन .
सृजन का हो शुभारम्भ ,
शरमाओ  मत ,
सुनो भी मित्र-
जीवन एक उत्सव है , जीवन है सामगान.




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