Wednesday, 31 August 2011

अरसे तक बंद रहा , अघोषित कारा में

अरसे तक बंद रहा ,
अघोषित  कारा में,
सालता था वहां का 
 अकेलापन , अंधेरा
और - सीलन भरी दीवारें

घुटन और संत्रास से
मुक्ति के लिए,
उठते थे हाथ ,
होठों से बुदबुदाहट में,
निकलती थी प्रार्थनाएं -

हे; इन्द्र, वृधस्र्वा देवता;
मेरा कल्याण करो  ,
पूषा ,विश्ववेदा  देवता;
मेरा कल्याण करो   ,
तार्क्षयो , अरिष्टनेमि देवता;
मेरा कल्याण करो   ,
बृहस्पति देवता;
मेरा कल्याण करो ,
मुझे कृपा पूर्वक ,
कल्याण प्रदान करो
 
एक दिन प्रार्थना सुन ली गयी ,
और -
टूट गयी - कारा ,
मैं चुंधियाती आँखों से देखता रहा ,
आलोक का विस्तृत पुंज,
भागते हुए लोग ,
मानो  बह रही हो नदी ,
ऊभ - चूभ लहरों सी जनावलियाँ,

कोई किसी से मिलता नहीं ,
नहीं करता किसी से कोई बात ,
न ही किसी से कोई सरोकार ,
बस- हर कोई ,
एक दूसरे को धकेलते हुए,
निकल जाना चाहता  है  आगे,
अघोषित प्रतिस्पर्धा ,-
सब   कुछ बटोर लेने  की चाहत.

चाहता था कि-
रोकूँ किसी एक को
पूछ  लूं - क्यों भाग रहे हो ?
कई बार की कोशिश,
परन्तु हो न सका सफल ,
बरबस धकेल कर,
निकल जाती थी लहरें -आगे ,
जैसे फेलने को आतुर कसेला धुंआ,
अनायास मैं भी लगाने लगा-
"दौड़" ,
लेकिन हो गए साथ फिर से -
अकेलापन , अन्धेरा ,
और- सीलन भरी दीवारें .   .   

No comments:

Post a Comment