Saturday, 14 April 2012

श्री राम आगमन की सूचना पर रावण का विचलित होना-


राम का वाहिनी सह , आगमन सुनकर ,
                     विचलित दशग्रीव , चिन्तना में डूबता.
सदन में यत्र -तत्र , भ्रमण वो करता है,
                     कभी जड़ हो कर के,शून्य में ही तकता,
विकृत आनन कर , नेत्र निमीलन कर ,
                     स्वगत भाषण कर , उच्छवास तजता.
भ्रमर में मानो कोई , जहाज उलझ कर ,
                      वर्तुल भ्रमण कर , दायें - बाएं झूलता.


झूलते जहाज पर , आरोहित जन-वृन्द ,
                       विचलित होते जैसे , रावण को मानिए.
यत्र-तत्र धावते हैं , त्राहि-त्राहि करते हैं ,
                       प्राण भय ढोते जैसे , लंकेश को मानिए .
किये अघ याद करे , मुक्ति मन्त्र जाप करे ,
                       काल ग्रास होते जैसे,रामारि को मानिए .
तृण  सम  जन को भी , सहायक मान कर ,
                       लगाते पुकार जैसे , यज्ञारि को मानिए .


राज-राजा दशग्रीव , चिन्तना में धंस  चले ,
                       मानो मृग शावक को , पंक खींच लेता है . 
चिन्तना से शून्य कार्य , जड़ करता है अद्य ,
                       सिंह देख शशक ज्यों , ठगा रह जाता  है .
करणीय कार्य अब , दृढ नहीं होते देख ,
                       असहाय हो कर के , राज्यादेश  देता है.
पा कर के राज्यादेश , भागे चले सभासद , 
                       मानो रज्जु बंधे पशु , स्वामी खींच लेता है.

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