Tuesday, 3 April 2012



राह में सघन वन , कई - कई वृक्ष मिले ,
                   दिवस में तम का भी,कई बार राज है.
आम्र व अशोक वृक्ष , पीपल व पाकड़ हैं,
                   बरगद बबूल नीम , फलित अथाह है.
तीव्र नद धार मिले,विस्तृत तडाग मिले,
                  झरनों की झरन में , अवरुद्ध राह है.
ऊभ -चूभ मार्ग हो या, सरल हो मार्ग चाहे,
                  बढे-चले जाते सब , राजा राम साथ है.


वारिधि के तट पर , पहुंची शीघ्र वाहिनी ,
                  मानो चाहता है नद , उदधि मिलन को.
वर वीर फैल गए , यत्र तत्र तट पर ,
                  मानो  चाहते  मराल , मुक्ता के चयन को .
श्रम परिहार हेतु , स्नान करते हैं वीर ,
                  मानो  चाहते  हैं  देव , सागर मंथन को .
चंचल वारिधि देख , राम अति गंभीर हैं ,
                  मानो  चाहते  हैं अद्य , सागर लंघन  को .


राज हंस  देख कर  , राम अनुज से कहे ,
                  युगल को साथ देख , सीता याद आती है .
अग्र गामी हंस होता , अनुगामी हंसिनी है ,
                  हंसिनी को देख-देख , सीता याद आती है .
वारिधि तरंगों में है , डोलता युगल यह ,
                   राम का भी त्रास यही,सीता याद आती है.
इस कूल हम बैठे , उस कूल वियोगिनी,
                    उदधि चुनौती देख ,सीता याद आती है .

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