Friday, 20 April 2012


मंदोदरी विहार से  , लौट रही सदन में ,
                    खोया-खोया डूबा हुआ  , देखती है नृप को .
चिंता-मग्न हो कर के , रावण गवाक्ष-पार्श्व 
                    अंतर टटोलता या , देखता नगर को .
भर आये कंज नेत्र , उमड़ा ह्रदय घन ,
                    भृत्य निर्गमन किये , रानी सजी पार्श्व को.
कोमल संस्पर्श किया , वाणी-अभिषेक किया ,
                    वैद्य देना चाहता ज्यों , पथ्य रुज ग्रस्त को.

प्रिय ! हम जानते हैं , सोच रहे वाहिनी को,
                   सीता हेतु राम आये , सीता सौंप दीजिए.
सीता शोध करने को , कपि सत्य सह आया,
                   तब सत्य चांप दिया , दंश आज  देखिए .
राम लोक-वाहिनी ले, आगये हैं कूल पर ,
                   सत्य तिस पर साथ , अजेय ही मानिए .
देख रहे प्रिय आप , देश भय-ग्रस्त हुआ ,
                   भय हितकारी नहीं , कारा मात्र  मानिए . 


प्रिय आप अंतर की , हित  वाणी  सुनिए ,
                    अंतर ने कह दिया  , सीता मुक्त कीजिए .
अंतर में उठ कर , सबल हो झंझावात,
                    मानस को मथ दिया , सीता मुक्त कीजिए .
विचलित अंतर में , संदेह उपज कर 
                    विश्वास को क्षीण किया , सीता मुक्त कीजिए .
प्रासाद के बाहर भी , प्रिय ! देश आप सम ,
                    विचलित कर दिया , सीता मुक्त कीजिए .

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