Saturday, 6 September 2014

विकल्प नहीं दिखता

पुस्तकें बिना हिले-डुले
बहुत कह जाती
उनकी बात सुनने के लिए
जरा उन्हें दिल के
करीब लेकर आना होता है 
पुस्तक के अंतर में
झाँकनी पड़ती है वो बातें
जिसे सलीके से
हमें चाहती है कहना
जैसे घर का बुजुर्ग
अपनी श्लथ काया के साथ
खटिया पर पसरा
मौन आँखों से
कहना चाहता है बहुत कुछ।
पुस्तकें बहुत सी स्मृतियाँ
ताजा कर देती है
उनमें उजागर होते रहते
रुई में लिपटे पड़े
वे रिश्ते
जिन्हें संवाद के समय भी
बहुत संभाल कर
उजागर किए जाते
कुछ वे रिश्ते
जिन पर हमारी आने वाली नस्ल
जिक्र करेगी
कुछ वे रिश्ते
जिन की छाप आपके अस्तित्व पर
इस तरह लग गयी
जिसे आप छुड़ाना
नहीं करते पसंद
जैसे, यह लाल पुस्तक
अब्बा की है
जिसमें लिखा है स्वजातीय गौरव
यह पीली पुस्तक
बहुत पवित्र
जिसने जिंदगी भर मेरे कान उमेठे
और आज मैं इस जगह
यह सुनहरी पुस्तक गौरी ने
गुलाब रख कर दी कॉलेज में
जिसमें आज भी दबे हैं
रंगीन काँच के टुकड़े से
जवानी के सपने।
अलमारी से झाँकती
ढेर सारी नई-पुरानी पुस्तकें
जिन पर देखी जा सकती हैं
असीम चिंताओं की रेखाएँ
जो सवाल उठाए हैं इन पुस्तकों ने
वे आज भी हल नहीं हुए हैं
उन्हीं सवालों में
उठा रही है एक सवाल
स्वयं के अस्तित्व का
हाँ, मैं भी बहुत चिंतित हूँ
पुस्तकों का विकल्प तो है
परंतु गुलाब और चिट्ठियों के साथ
बनने वाले नर्म रिश्तों का
विकल्प नहीं दिखता ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

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