एक चिड़िया

मधुर ताने
छेड़ती है
भोर से ही
एक चिड़िया,
ज्यों संवेदना में 
गूढ बातें
कह रही है
एक चिड़िया ।
कल तलक तो
धूप गहरा
जुलसा रही
हरित दुर्वा,
पेड़ सारे
शिथिल होते
लताएँ मरी जाती
जो हरित पर्णा।
गर्म वातावरण मेँ
उचित गाती
एक चिड़िया ॥
कहाँ रुके हैं
नीलनभ के
खग समान
घनश्याम प्यारे,
कहाँ जा के
बस गए हैं
प्राण सम
जलद सारे।
संवेदना को
स्पष्ट करती
एक चिड़िया ।।
वह जानती है
पत्थरों पर भी
उग आती है
हरित पत्ती,
बह जाती है
मधुर धारा
दह रही हो
जब नर्म धरती।
तपस्विनी सी
बोध देती
एक चिड़िया ॥
गर्म वातावरण मेँ
उचित गाती
एक चिड़िया ॥
-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज.)

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