बसा लूँ आज तुम को

विश्राम का समय कहाँ
कुछ देर निहारूँ
खुला गगन खुली धरती
और इनमें अभिव्यक्त तुम को।
जानता हूँ बहुत कुछ है
हर दिशा में
जो इस समय अवांछित
शांत क्षण का एक अवसर
दर्शा रहा एक क्षण में मुक्त तुम को ।
पास में निधि बहुत थी
वह असमय ही खो गयी
फिर से जुट गयी
हाथ मेरे नेह की अक्षय निधि वो
लो समर्पित कर रहा हूँ भव्य तुम को।
कौन जाने कब कहाँ
कौन आए कौन जाए राह में
समय निर्मम दौड़ कर
सब की बहियाँ देखता
बात दिल की कह चलूँ आज तुम को।
अंगार पर बैठा हुआ
साधता हूँ साधना के पथ सभी
पंचाग्नि भी शर्मा रही साधना में
मर रहा या जी रहा पर चाहता
हर रोम में बसा लूँ आज तुम को ।
- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद।

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