बोझे से छुटकारा

शाख झुक गयी,
फल जो लगे थे,
लेकिन, सूखा ठूंठ
अकड़ कर तना रहा,
अब ठूंठ के 
फल नहीं होंगे।
लरज़ती फलवती शाख
और अकड़ाये हुए तने में
बस उतना ही अंतर है,
जितना कि ,
किसी एक की सांस चलती है
दूसरे की सांस नहीं चलती है।
जिसकी सांस नहीं चलती है
वह चलता ही नहीं,
उसे ढोना पड़ता है
जैसे शव चलता नहीं
उसे बोझे की तरह
वहन करना होता है।
बोझा हम ढोते हैं
विवशता से
या,
तथाकथित मर्यादा के
रुक्ष बंधनों से,
फलस्वरूप,
कंधे टूटे जाते हैं,
पैर थक जाते हैं
मन घायल विहग सा
फड़फड़ाता है
आत्मा तो मरी जाती है ।
मुक्ति साहस में है,
साहस दिलाता है
कंधों को झटका कर
बोझे से छुटकारा,
तन और मन को
देता है आराम
और,
आत्मा तो पा लेती
ब्रह्मराक्षस जैसे बोझे से छुटकारा
वह पा लेती है अपना अभीष्ट
जैसे नंदनवन में
राधा को मिल जाये कुंजबिहारी।
-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमंद (राज

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