Monday, 7 May 2012

एक कपि हनुमान , लंका में निश्शंक हो के,
                  भ्रमण वो कर-कर , सब देख जाता है .
भ्रष्ट कर के व्यवस्था,उपवन में पहुँच  ,
                  रक्ष वीर मार-मार,सीता देख  जाता है .
राम सहिदानी दे के,सीता का सन्देश ले के,
                  प्राण प्यारी लंका को वो,दहे चला जाता है.
हो कर के स्वच्छंद वो,करता है विध्वंश वो .
                  स्वर्ण चैत्य प्रासाद को , ढूह कर जाता है .

कपि-ऋक्ष-वनवासी,ले कर के अब राम ,
                  जलधि के तट तक , सहज में आ गए .
बलशाली कपि वीर , भीमकाय ऋक्ष वीर,
                  श्रमशील वनवासी , घन सम आ गए.
लक्ष्मण है वह्नि सम, सुग्रीव है क्षपा सम,
                  अंगद भू-कंप सम , वर वीर आ गए .
जाम्बवंत-हनुमान , नल-नील-सुषेण जो,
                  राम ज्वालामुखी सह,विस्फोट से आ गए .

कई-कई युक्ति कर ,शीघ्र सेतु बाँध कर ,
                  वारिधि को पार कर,लंका चढ़ आयेंगे.
कपि मात्र एक आया ,छिन्न-भिन्न कर गया,
                  अब राम लोक सह , रोक नहीं पायेंगे.
समय है अभी शेष , मन्त्र चाहिए विशेष ,
                  एक मत होने पर , सही दिशा जायेंगे .
स्वर्ण लंका रावण के , शोणित से सिंची हुई ,
                  प्रश्न विकराल खडा , कैसे बचा पायेंगे?

तभी निशाचर वीर , एक साथ बोल पड़े ,
                  राज राजा दशग्रीव , रणधीर  आप हैं.
देव नर नाग कोई , अद्य हम सम नहीं ,
                  देवराज इन्द्र भी तो , मर्दित है आप से.
अतल व वितल में , निशाचर तंत्र रहा ,
                  निशाचर हैं अधीन , मात्र अद्य  आप के.
राम वाहिनी के सह , आये हैं वारिधि तक ,
                   देख लेंगे हम मिल , विषय न आप के.


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