Friday, 25 May 2012

मैं मिट्टी का कण 



मैं मिट्टी का कण ,
हूँ तो हूँ ,
हूँ अपने में परिपूर्ण ,
यही मेरा विश्वास. 

निश्चित  है मेरा रंग -रूप ,
निश्चित  है आकृति -प्रकृति ,
निश्चित  है यति - गति ,
निश्चित  है रस - गंध .
नहीं तरल  हूँ , नहीं सरल  हूँ ,
फिर भी,
उज्ज्वल है इतिहास 
यही मेरा विश्वास. 

वीथी से पक्के पथ पर मैं,
निर्जन वन से बस्ती तक मैं ,
कच्चे-पक्के सब सदनों में ,
ऊपर- नीचे , सब कोनों में .
मटमेला मिट्टी का कण  हूँ,
फिर भी,
निश्चित  है विलास  ,
यही मेरा विश्वास. 

नहीं  पुष्प हूँ , नहीं  रत्न  हूँ ,
मुग्धा का हूँ नहीं स्वर्ण-हार .
नहीं नक्षत्र-रवि-मयंक हूँ ,
नील नभ का हूँ नहीं श्रृंगार ,
ये सब रज-कण की कृतियाँ,
फिर भी,
मिलता है उपहास ,
यही मेरा विश्वास.

ब्रह्म-रूप में श्रष्टा मैं हूँ ,
हरि-रूप में भर्ता मैं हूँ,
हर रूप में हर्ता  मैं हूँ , 
ऋत-सत्य-तप भी मैं हूँ .
मुझ में अक्षय ऊर्जा श्रोत ,
फिर  भी,
विमुख  रहा  उल्लास ,
यही मेरा विश्वास .

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