Friday, 11 November 2011

चतुस्पदियाँ


प्यार की लो जली थी ,तभी   सृष्टि  मुस्कराई .
जो हंसना सीख गया,उसने ही नव राह बनाई . 


लोक-लाज सब छोड़ कर ,चले कामिनी  संग.
अग्निवेश को क्या हो गया,तप कर डाला भंग.
तप कर डाला भंग, लो लगा बैठा दुनिया से,
रस भरी होगी बतियाँ, वार करेंगे अँखियाँ से,
जींस टी.सर्ट पहनेंगे ,जल्दी से भगवा छोड़ कर.
स्वयंवर में पहुंचेंगे ,लोक-लाज सब छोड़ कर ,


कंप्यूटर में उलझ गए, लल्ला -लल्ली - ताऊ.
दिन भर चिंता में निकले,क्या लिखें भड़काऊ ?
क्या लिखें भड़काऊ ?प्रतिक्रिया मिले निरंतर,
अपना भी हो नाम ,चले कुछ  जंतर - मंतर.
उलटा-सुलटा लिख ,ऑफिस में पहुँच गए .
वहां लगी फिर लात ,कंप्यूटर में उलझ गए,


बिजली की कोंध से , वे आये और चले  गये.
हम हैं कि उनके ही , ख्यालों में  उलझ  गये.
वे लौट कर आये भी , सामने ही खड़े हो  गये.
आँखे उठती ही नहीं,कमबख्त होंठ सिल गये.


लाख कह लें हसीन हैं ,प्यार की राहें .
कह लें  खुदा की खुदाई ,प्यार की राहें .
गले फँसी फाँस सी,कलेजे लगी शूल सी  .
नागिन और कटार सी है, प्यार की राहें .


उनका  मुस्कराना था , बौराना हमारा  था.
उनका हाय करना था , कटना  हमारा  था. 
वे लहरा के  घूम  जाएँ , इतराके रुक  जाएँ .
आह!मीठे बेन बोल जाएँ ,मरना हमारा था.

भूख की तड़फ देखी,शीत की गलन  देखी.
तंग कपडे में लाज , ग्रीष्म में जलन देखी.
ताउम्र  फुटपाथ  पर , सड़कों-चौराहों  पर.  
ज़िन्दगी-पतंग ताने,साँसों की लड़ंत देखी.  


द्वार खोल-खोल कर, साँसे थाम-थाम कर ,
         बाट जोह- जोह कर ,मन  को  मसोसती .
राम -चित्र रच  कर ,पुष्प-पत्ती जड़ कर  ,
             खूब सोच-सोच कर,राम को पुकारती .
सीता दिन-दिन भर ,भूखी-प्यासी रह कर ,
             रोती राम- राम कर ,अंगुली मरोड़ती.
रावण  की बगिया में,अबला अकेली हूँ जी  ,
         कह-कह राम जी को ,सर को वो फोड़ती.


राजीव से दूर हुई ,रावण की वाटिका में ,
                सीता सुध खोये बोले , मैं तो डूबी राम जी.
चिड़िया को चुग्गा देती ,पौधों को पानी देती ,
               भरमाई सीता कहती , यहाँ देखो राम जी.
भोजन की थाल देख , पानी की सुराही देख,
                घूंघट को खींच कहे, खाना खाओ राम जी.
खुद की ही छाँव देख ,रोवे हँसे बतियावे, 
                 कभी भाग-भाग कहे, घर चलो राम जी.



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