Friday, 25 November 2011

नगर के चहुँ ओर , हलचल अतिशय ,
                    सुभट  के  दल  से है  ,रक्ष - देश  रक्षित .
गज-अश्व उष्ट्र -खर, सुरथ की सवारी है,
                     दौड़ रहीं डोलियाँ हैं , दीन यहाँ शोषित .
अति लोल ललनाएं , रुचिर श्रृंगार किये,
                     मदन संचार  करे , मार  हुआ  वन्दित.
नर सब भीम काय , भोग की ही लिप्सा में ,
                     मद्यपान  में ही रत , धर्म हुआ उपेक्षित .


हनुमान रुककर , क्षण भर सोचते हैं,
               यत्र-तत्र स्वर्ण-सज्जा,भोग की ही संस्कृति .
रक्ष-नर हिंसा रत, अहिंसा पानी भरती ,
                दया- धर्म -प्रेम नहीं , विकृति  ही  विकृति.
रक्ष- देश ललनाएं , उन्मुक्त हो के रहती,
                लाज- शर्म -त्याग नहीं,  है मकारी प्रकृति.
आतंकित  नर-वृन्द  , भयभीत  देव-वृन्द,
                दशानन  का  देश है  ,  दमन  की  आकृति.


लंक- देश में पतित , देख कर मूल्य को,
                 क्रुद्ध हुए कपि श्रेष्ठ , छूट गयी लघुता .
पूर्व रूप पाते ही , देख लिया प्रहरी ने, 
                 अस्त्र-शस्त्र ले के दौड़े,उनकी ही प्रभुता.
कपि कहाँ चुप रहे ,छीन लिए अस्त्र-शस्त्र,
                   इक्षु दंड सम चीर , बताई दी  गुरुता .
पार्श्व में प्रासाद देख ,पुनः लिया रूप लघु , 
                   वेग से प्रवेश कर ,काम ले ली दक्षता.                 

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