Tuesday, 29 November 2011

नित्य कर्म से निवृत्ति,शीघ्र कर विभीषण ,
                 सरोवर  तट  पर , हंस  सम दिखते .
अश्व - दश साध कर,संध्या-वंदन करते ,
                 अर्चन समय पर ,पुष्प  सम खिलते.
गुरु-गौरी पूज कर , राम-नाम भज कर ,
                 कपि-वर भेंट कर  , मित्र सम लगते.
गुणवंत हनुमान , तत्काल बोल उठे ,
                 कहो मित्र आप कैसे,दुखी सम रहते ?


भूपाल जिस देश  का  है कुत्सित-अहंकारी  ,
                   कल्पित है सुख वहाँ , सत्य है बुद्धिमंत.
है उत्कोची सभासद , कर्मचारी - अधिकारी ,
                    जीवन अशांत वहाँ , सच कहूँ गुणवंत .
स्वेच्छाचारी जन-वृन्द , भ्रष्ट-मूल्य में जिये ,
                    ऐसा राज लुप्त होगा,देखिये ज्योतिर्वंत 
आह लम्बी भर कर, बोल गये विभीषण ,
                    अग्रज  हैं दशग्रीव ,  दुख  है  हनुमंत .


अपहरण - तस्करी,लूट जहां गर्व हेतु,
                     कपि-श्रेष्ठ समझिए , तत्र मुख्य स्वार्थ है.
शोषक व अत्याचारी , पाते हैं प्रतिष्ठा जहाँ ,
                     प्रज्ञा  वहाँ  मर जाती , तत्र  तु  कदर्थ  है.
दश अश्व मुक्त कर, तन - रथ डोलता है ,
                      मार वहाँ मुख्य होता , तत्र सर्व व्यर्थ है.
सीता सती हरी जाती , नारी वस्तु मानी जाती,
                       वहाँ सुख - शांति नहीं , तत्र तु अनर्थ है.

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