Sunday, 22 July 2012

तेरे ही जूड़े ,फूल गूंथना , घर पर आना.


हमें देख कर मुस्काते हो , घर पर आना .
चाय पियेंगे , बात करेंगे , घर पर आना.

गुड़हल की शाखाओं पर ,
लकदक हो कर फूल झूलते .
लाज सरीखे उन फूलों से ,
मधुकर आ कर भाव पूछते .

तेरे ही जूड़े ,फूल गूंथना , घर पर आना.
चाय पियेंगे ,बात करेंगे , घर पर आना.

बरसाती मेघों को लेकर ,
गीले-गीले गीत लिखे हैं .
सूत्र सरीखे कच्चे रिश्ते ,
उन गीतों में खूब जिये हैं .

दुर्वा पर बैठे ,गीत पढेंगे , घर पर आना.
चाय पियेंगे ,बात करेंगे , घर पर आना.

बहुत सहेज के रखे  हुए है,
वो तेरे - मेरे निर्मल बचपन .
फटी पुस्तकें जीर्ण खिलौने ,
अब भी कहते अपनी अनबन .

चलो सुलह , करने बैठें ,  घर पर आना.
चाय पियेंगे , बात करेंगे , घर पर आना.


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