Saturday, 12 January 2013

सहस्त्रशीर्ष का हिस्सा हूँ.

वो पैर ही काटने पर तुले ,
पैर मेरे काटे भी गये .
परन्तु ,
मैंने नवीन पैर उगा लिए ,
हा-हा-हा ,
मैं अब भी चलता हूँ .

कुछ लोगों को ,
मुझ से रही सहानुभूति ,
कुछ ने दिखलाई दया,
पर गीत दर्द का ,
सदा साथ रह ,
मुझ को करता था प्रेरित ,
( अब भी बहुत प्रभावी )
उठा-गिरा और रेंगा भी था,
धीरे-धीरे लंगड़ाता चलता,
आखिरकार हा-हा-हा ,
मैं अब दौड़ पडा हूँ .

नित्य यज्ञ-कुंड,
धू-धू कर जलता रहता,
कर्म-साधना के मन्त्रों से ,
चारों ओर गर्म दहकते ,
अंगारों वाली ज्वाला में ,
चेतनता की लगा आहूति,
अपना हंसिया ओर हथौड़ी,
अपने हाथों हा-हा-हा ,
मैं हाथ तोलता जाता हूँ .

लो देखो-देखो-देखो ,
जी भर कर देखो ,
अब मेरे सहस्त्रपद ,
काट सको तो काटो ,
खुली चुनौती अब मेरी है,
वह बीत गयी सो बात पुरानी ,
तरल-सरल किसी नदी सा,
तुझ को भी अपने में ,
लय करने को आमादा ,
( अब मैं नहीं अकेला )
मैंने तो अपना ,
सिर ही सौंप दिया हा-हा-हा ,
अब मैं सहस्त्रशीर्ष का हिस्सा हूँ.

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

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