Friday, 10 May 2013

सद्भावना का मूल्य , कभी नहीं चुका .


सद्भावना का मूल्य ,
कभी नहीं चुका ,
वह बदले में ,
मांगती है सद्भावना .

जिंदगी हरहरा कर ,
बढ़ रही ,
किसी बेल की तरह .
रोज उस पर खिलती है ,
जीवंत संभावनाएं ,
मधुर फल की तरह .
सद्भावनाओं की ,
सहस्त्रधार के बल पर ही ,
यह संभव होता हुआ,
तुम ने भी ,
अनुभव किया होगा .

भटका हुआ भी ,
किसी सदाशा के बल ,
दिशा तलाशता है .
जब कोई दिशा ,
हाथ नहीं आती ,
तब सहज ही उस का ,
रुदन फूट जाता है .
वह जानता है ,
अरण्यरुदन व्यर्थ होता है ,
पर,
सद्भावनाओं के बल
श्रुति उसे ढूंढ ही लेगी
सदभावनाएँ उद्धारक होती है.

सद्भावनों के बल पर ही
आज श्वांसें गह रहे हैं
किसी कलावंत की तरह ही
जिंदगी को गढ़ रहे हैं
उसर भाव-भूमि पर
उगाई थी तुलसी
वह आज पनपती सी
दिखाई दे रही है
मित्रों !
प्राची में पनपती लाल किरणें
मांग में बिछे कुमकुम सी
सद्भावनाओं को भर रही है
अब उस को ही सहेजें .

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

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