Friday, 10 May 2013

महाभारत ने , एक युग लील लिया था .


मुझे डर है
किसी अनहोनी का
तुम फिर भी
सोये हो .
सुनते ही नहीं ,
वे आवाजे ,
जो उठी है ,
प्रतिक्रिया में ,
जो तुम्हारे ,
खिलाफ जाती हैं .

शायद ,
तुम सोचते होंगे ,
इन लूले-लंगड़े
और ,
बेदम अपाहिजों की ,
आवाजों से ,
क्या फर्क पड़ता है ?
परन्तु ,
सच यह है मित्र ,
इन अपाहिजों की ,
चित्कारें ही ,
पूरा का पूरा ,
युग लील जाती है ,
फिर तुम भी तो ,
इन जैसे ही तो हो .

कभी एक शासक ,
द्रुपद ने ,
दीन द्विज द्रोण का ,
उपहास उड़ाया था ,
और ,
उस के मैत्री भाव को ,
सत्ता के मद में ,
रोंदा था ,
द्रोण की प्रतिक्रिया में ,
द्रुपद श्वान की तरह ,
दुत्कारा गया था ,
वह भी तो एक कारण ,
महाभारत का बन गया था ,
तब ,
कुछ असमर्थों की प्रतिक्रिया ,
महाभारत ने  ,
एक युग लील लिया था .

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द .

No comments:

Post a Comment