Friday, 31 May 2013

प्रताप मेवाड़ सा है , मेवाड़ प्रताप सा है

भाग्य के भरोसे कभी , कर्मशील नहीं रहे ,
                       पतवार लिए हाथ , लड़ लेते धार से .
धूम्र देख होते खड़े , ज्वाल की तरफ बढे ,
                       चिंता नहीं कौन साथ , खेल जाते आग से.
भाग्य के भरोसे बैठ , गाते गीत भाग्य के हैं ,
                       काल के बंधन बंध , मारे जाते काल से .
कर्मवीर जगत में , नभ के सितारे से हैं ,
                       धरा उन की रही है , वे हुए प्रताप से.

जो निठल्ले ही रहे हैं , खाते रहे सोते रहे ,
                       दिवस को व्यर्थ किया , व्यर्थ के प्रलाप से .
वे निठल्ले चीखते हैं , दस दोष देखते हैं ,
                       देश को वे हीन कहे , व्यर्थ के विलाप में .
कर्मवीर सदा चले , नहीं देखे धूप-छाँव ,
                       सृजन को देखते हैं , देश के विकास में .
देश पे विपत देख , कर्मवीर वरवीर ,
                       असि धार दौड़ पड़े , सिंह से प्रताप से.

दौड़-दौड़ अरि कहें , आ गये प्रताप यहाँ ,
                       मार रहे काट रहे , हम को बचाइए .
झुण्ड-रूप दे कर के  , भेज दिए राणा ओर ,
                       जोड़ हाथ कहे झुण्ड  , हमें न कटाइए .
रुदन में अरि कहे , हाय अल्ला कहाँ फंसे ,
                       मेवाड़ के चंगुल से , हम को निकालिए .
कहाँ छिप गये यहाँ , अकबर मानसिंह ,
                       रूद्र सा प्रताप दिखे , कोई तो बचाइए .

मेवाड़ की ललनाएं , सजन से कह रही ,
                       देशहित भीड़ जाओ , अकबरी दल से .
हल्दी सम हल्दी घाटी , रक्त में नहाई हुई ,
                       लाल-पीली हो रही है , अकबरी दल से .
प्रिय घर लौटें तभी  , अरि की विदाई हो ,
                       लड़-लड़ मर जाना , अकबरी दल से .
प्रताप मेवाड़ सा है , मेवाड़ प्रताप सा है ,
                       दो-दो हाथ कर आओ , अकबरी दल से .

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द.

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