Monday, 27 May 2013

मृत्यु के नग्न उपासक

गूँज गये जंगल-शहर
बंदूकों की गरज में
और ,
उस दरमियान ,
सहमा तो केवल ,
मासूम आदमी .

हाँ , वह आदमी सहमा ,
जो रोज रोटी की,
जुगत में ,
ना जाने कितनी बार ,
जमीन में गड़ जाता है .
हाँ , वह आदमी सहमा ,
जो रोज अपनी लाज को ,
बचाने के चक्कर में ,
ना जाने कितनी बार ,
दुत्कारा जाता है ,
हाँ , वह आदमी सहमा ,
जो रातों की भयानक ,
सांय-सांय करती ,
काली वेला में ,
अपना सर छिपा लेने के ,
असफल प्रयासों में ,
ना जाने कितनी बार ,
धवल संस्थाओं से
नोच लिया जाता है .

गूँज गयी काली बंदूकें ,
भीषण गर्जन करती ,
लोकतंत्र में ,
साथ उसी के ,
छांट गयी ,
गर्म रक्त के फव्वारे ,
दृश्य बहुत निर्मम और विभत्स,
जैसे मरघट जाग गया हो ,
रक्त-मांस से सने हुए चिथड़े ,
इधर-उधर फैले-फैले ,
शव बिखरे हुए धरा पर ,
मानो कहते हैं ,
उन काले हत्यारे की ,
रक्तिम निर्मम ललकारों को .

जीवन का धवल पक्ष ,
हत्यारे नहीं जानते ,
शायद धवल रोशनी से ,
उनका परिचय कहाँ ?
जीवन के सन्देश संवाहक ,
हत्यारे नहीं जानते ,
शायद सन्देश संवाहक को ,
ले जाने वाले पथ से ,
शायद उनका परिचय हुआ कहाँ ?
जीवन की संस्कृति के सरगम को ,
हत्यारे नहीं जानते ,
शायद जीवन संस्कृति के सरगम को ,
हत्यारों की श्रुति ने सुना कहाँ ?
उनका परिचय केवल ,
बीहड़ और अंधियारे से है ,
काली-काली बंदूकों से है ,
हत्याओं और मरघट से हैं ,
वे मृत्यु के नग्न उपासक ,
जीवन का आराधन करना ,
हत्यारों की प्रवृत्ति का भाग नहीं है .

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

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