Wednesday, 22 May 2013

हम कितने लाचार हो गए

रात के व्यवहार को ,
हम सुबह भूल जाते हैं ,
और ,
आज दिन के  व्यवहार को ,
कल तक भूल जाते हैं ,
उस के बाद ,
फिर वही , रोजमर्रा की जिन्दगी ,
हम कितने सुविधावादी हो गए .

बोलना था हमें ,
वह बोल दिया ,
क्या बोला ? उस से ,
हमें क्या लेना-देना ?
हमारे बोल पर ,
कोई मर मिटा ,
या ,
सर धुन कर रह गया ,
या,
आँखों में आंसुओं को ,
अटका कर रहा गया ,
उस सब से हमें क्या ?
हम भूल जाते हैं ,
हमारे शब्द-भेदी बाण ,
और उस के बाद ,
फिर सक्रीय हो जाते हैं ,
हमारे भाषाई दांव-पेंच ,
हम कितने व्यावसायिक हो गए.

कब हम किस के गले मिलेंगे ,
या ,
उस के सामने आते ही ,
नाक-भोंह सिकोड़ेंगे ?
हम खुद कह नहीं सकते ,
पता नहीं , किस क्षण ,
सामने वाले के हाथ से ,
हमारे पास , हमारे मतलब का ,
सामान हाथ लग जाए ,
या ,
उस के मतलब का सामान ,
हमारे हाथ से , खिसक जाए ,
इस हेतु ,
हम अभिवादन से ही ,
व्यवहार के क्षेत्र में ,
फूँक-फूँक कर कदम रखते हैं ,
सच है ना ,
हम कितने अवसरवादी हो गए .

स्त्री ..........स्वतंत्रता की आवाजें लगा रही है ,
वह स्वतंत्रता की चाह में ,
भागती है , खांसती है ,
लड़ती है , ललचती है,
रहस्यमय बनती चली जाती है ,
दोसरी तरफ पुरुष...........
पिछड़े अगड़ों को ,
मिटटी में मिलाने को कटिबद्ध हैं ,
अगड़े पिछड़ों को ,
पीछे ही धकेलने में मशगूल हैं ,
एक जात दूसरी जात को ,
एकदम पीस देना चाहती है ,
हर कोई सामने वाले का ,
कंधा इस्तेमाल करने को व्यस्त है ,
एक दूसरो सीढ़ी बनाने में दत्त चित्त है
बस , ..............आदमी जहां भी है ,
वह भोंचक्का सा है ,
उस के सामने ,
बाढ़ और सूखा है,
दंगा और आग है,
भूख और लाचारी है,
जोर और जबरदस्ती है ,
इस माहोल में ,
हम कितने लाचार हो गए . 

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