Saturday, 25 May 2013

गांधारी और धृतराष्ट्र से हो गये

कंधे से कंधा सट गया ,
परन्तु अभी तक ,
समझ में नहीं आया ,
आखिर कर ,
कौन क्या चाहता है ?

अब वे चिल्लाना बंद करें ,
तो कितना सुखद हो जाए ,
तनिक देर ,
कहीं बिना शोरगुल की ,
नम जगह बैठ कर
मैं परिस्थितियों को ,
ठीक-ठीक समझ सकूं .

न जाने क्यूं
कुछ लोग सर पर आकर ,
धमक जाते हैं ?
हाथ में झंडा लिए ,
बन बैठते हैं मसीहा,
शोरगुल हो-हल्ला ,
भीड़-भगदड़,
अखबारों के शीर्ष पर ,
छपती कुछ घटनाएँ ,
आकाशवाणी - दूरदर्शन पर .,
चीखती हुई ,
परावर्तन के सह कुछ बातें .

नयी-नयी बातों के ,
वजन में ,
कुचल जाती हैं ,
वे पुरानी बातें ,
जिन्हें जानना ,
जरूरी था .
शोर-गुल , भीड़-भक्का ,
आपाधापी और संशय में ,
गर्दी इतनी उड़ती है ,
साँसों को जबरन ,
घटकना भी दुष्कर है .

सभी के सभी उत्सुक ,
किसी नये
घटनाक्रम के लिए ,
जिस से कि ,
दिवस कुछ ,
रोचक तरीके से निकले ,
अब हम ,
आदी हो गए हैं ,
केवल घटनाएँ सुनने को,
सब के सब ,
गांधारी और धृतराष्ट्र से हो गये ,
जब कि बनना था ,
कृष्णार्जुन सभी को .

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द (राज.)

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