Sunday, 19 May 2013

वाकई , मैं पागल हूँ .


तुम ने मुझ को ,
पागल कहा ,
ठीक ही तो कहा ,
इस में गलत क्या है ?
तुम मेरा यकीन करो ,
मुझे तुम से ,
कोई शिकायत भी नहीं ,
वाकई , मैं पागल हूँ .

तुम कह चले ,
अब कभी लौट कर ,
तुम आओगे नहीं ,
फिर भी मुझे तुम्हारी ,
प्रतीक्षा रहती है ,
आने-जाने वालों से ,
तुम्हारी खोज-खबर लेता हूँ ,
वाकई , मैं पागल हूँ .

मेरे शरीर पर अब भी हैं ,
तुम्हारे नाखूनों के व्रण-चिह्न ,
जिन से कभी रिस कर ,
टपक गया था ,
मेरा सिन्दूरी लहू ,
और,
तुम्हारे नाखून ,
रक्तिम आभ लिए लहू में ,
दिप-दिप कर ,
दमक कर रह गये थे ,
मैं अब भी तुम से प्राप्त ,
व्रण-चिह्नों में ,
तुम को अनुभव करता हूँ ,
वाकई , मैं पागल हूँ .

कभी लिखी थी ,
जो कवितायें तुम को ले कर ,
जिन पर पाटल रख तुम को सौंपा था ,
तुम ने उन कविता-पत्रों को ,
पाटल सहित पटक धरा पर ,
अपने पदत्राण से कुचला था ,
वे अब भी वैसी की वैसी ,
पड़ी धरा पर सुबक रही हैं ,
मैं हूँ कि ,
तुम को ले कर फिर से ,
इक नयी कविता ,
लिखने बैठ गया हूँ ,
तुम को पाने की ,
अदम्य लालसा में ,
वाकई , मैं पागल हूँ .

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमन्द.

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