Sunday, 23 October 2011

दीपोत्सव के इस महापर्व पर, सुनो प्रिये! मैं आभारी हूँ.

दीपोत्सव के इस महापर्व पर,
सुनो प्रिये! मैं आभारी हूँ.




दीपोत्सव के इस महापर्व पर,
सुनो प्रिये! मैं आभारी हूँ.


कोना-कोना  झाड़-पोंछ कर ,
तुम घर में  शुचिता ले आई ,
घर-आँगन यूं दमक रहे हैं,
जैसे दमके देह तुम्हारी ,
दीपोत्सव के इस महापर्व पर,
सुनो प्रिये! मैं आभारी हूँ.


दौड़-दौड़ कर तुमने मेरी ,
बिखरी टेबल खूब जमाई ,
इधर-उधर बिखरी रचना को,
बाँध पुलिंदा खूब संजोई ,
बदले में क्या दे सकता हूँ ?
सुनो प्रिये ! मैं लाचारी हूँ.

जीर्ण-शीर्ण कपड़ों की गठड़ी,
कृषक प्रिये को दे डाली ,
रद्दी कागज अखबारों की,
झट-पट कर डाली नीलामी,
अब यह घर है गंग-यमुन सा,
सुनो प्रिये! मैं व्यवहारी हूँ.

कोर किनारी मांडने रचकर ,
कदम-कदम पर दीप सजाये ,
जैसे नील वर्णी साड़ी पर,
पिरो दिये हों सलमा-सितारे ,
तेरी चित्रकारी के क्या कहने,
सुनो प्रिये! मैं आह्लादी हूँ.

आगत मित्रों को बड़े स्नेह से 
भांत-भांत के व्यंजन देती ,
अभ्यागत और मंगतों को भी ,
खाली झोली नहीं भेजती ,
तेरी ममता ही बोल रही है ,
सुनो प्रिये! मैं संचारी  हूँ .








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