Saturday, 11 February 2012

कपि कह नत हुए , राम के श्री चरणों में,
                 राम अंतर हिलता  ,थर-थर कर के .
कंज नेत्र आद्र हुए , कोर भरे अश्रु जल,
                 मानो ज्वार वारि खींचे , हर-हर कर के.
राघव नरसिंह  ने , खींच लिया एक सर ,
                 मानो फणि निकला हो , सर-सर कर के .
सुघ्रीव को कहते हैं , चल पड़ो लंक ओर ,
                 कहते हैं मानो कोप , भर-भर कर के.    


सुग्रीव  प्रणाम कर  , रामाज्ञा स्वीकार  कर , 
                 जाम्बवंत को कहते, ध्वज फहराइये .
अंगद को कह कर  , आदेश अंकन कर 
                 यूथपति स्मर कर , दल बुलवाइये .
चर भेज - भेज कर , पथ सब  हेर कर ,
                 अरि के प्रबंध सब  , ठीक जान जाइये. 
हनुमान अग्र कर , सैन्य संगठन कर ,
                 साधन को साध कर , कूच कर जाइये .  


हर दिशा गूँज गयी , नगाड़ों की थाप पर ,
                  शाखामृग बढ़ गये ,  कपिराज दुर्ग को.
शाखा-शाखा चलते हैं , कूदते हैं धावते हैं ,
                 उठा लिया सर पर ,  हुंकारी से वन को .
भीम काय ऋक्ष वीर , गरज-गरज कर ,
                 गुहा से निकल कर , ठोकते हैं ताल को.
सीधे-सादे वनवासी , ढोल पीट-पीट कर  ,
                  बढ़ गये लेने हेतु , रावण से स्वत्व को.

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