Friday, 3 February 2012

हनुमान कथन से ,  राम गुरु गंभीर हो ,
               कहते हैं वानर से , सीता हाल कहिये .
आप मम हितकारी , सखा और सेवक भी ,
               अभय  समझ  कर , हर बात कहिये .
अतुलित बल युक्त , संकट मोचक रह ,
               मम सह सुपूजित , वरदायी बनिये.
सीता शोध सुकृत है , रक्ष-तंत्र विकृत है, 
               अब सीता संवाद को , खुल कर कहिये.


तब हनुमान सादर , कंकण को सोंप कहे  ,
                प्रभु सीता सहिदानी , आप हेतु लाया हूँ  .
कंकण को देख प्रभु , वक्ष पे लगाये कहे ,  
                अरे सखा ! कंकण को , मैं खूब जानता हूँ . 
अरे यह कंकण तो , वरमाल सह देखे ,
                कर-कंज भिन्न देख , त्रास ही तो पाता हूँ .
सजल नयन हुए , कंठ रुद्ध होता जाता,
                प्रिये ! तुम्हे कष्ट में ही , सदा लिप्त पाता हूँ .


राघव को त्रस्त देख , लक्ष्मण उद्दीप्त हुए ,
                मुख रक्त रवि सम , तत्क्षण ही हो गया  .
कर गहे वज्र धनु,  अवयव  दृढ हुए ,
                वर वीर व्याघ्र सम , क्रुद्ध वह हो गया.
प्रभंजन अंतर में , उमड़ चला है पर ,
                राम अनुशासन में , स्वर रुद्ध हो गया.
अनुज की प्रतिक्रिया , देख कहते हैं राम ,
                कपि! सीता-सन्देश तो , अवरुद्ध हो गया.               

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