Saturday, 4 August 2012

जगो कवि ! दिवस हो गया.


शिशु भोर की प्रथम किरण ,
दस्तक देती मेरे द्वारे ,
जैसे गोपालिन आकर के ,
गोरस लिए हुए पुकारे ,
जगो कवि ! दिवस हो गया.

शीतल वायु हुई प्रवाहित ,
मेरी चादर हिला गयी है ,
मानो कोई हॉकर आ कर ,
अखबार लिए दस्तक देता ,
जगो कवि ! दिवस हो गया.

प्राची में पेड़ों के पीछे ,
लिए अरुणिमा सूर्य निकलता ,
जैसे कोई चंचल बालक ,
रंगीन गुब्बारे लिए गा रहा  ,
जगो कवि ! दिवस हो गया.

घर पिछवाड़े कोयल जागी  ,
कु-हू कु-हू कर कूक लगाती ,
सोती भावज ज्यों करे शरारत  ,
गये स्वप्न आपाधापी आती ,
जगो कवि ! दिवस हो गया.


No comments:

Post a Comment