Monday, 20 August 2012

जिन्दगी तुम दुर्वा सी ,


जिन्दगी तुम दुर्वा सी ,
कभी पल जाती हो ,
कभी थम जाती हो .

सुख-दुःख तेरे ,
दो हैं किनारे ,
साथ चले ये सांझ -सवेरे.
जिंदगी तुम नदिया सी ,
कभी बह जाती हो,
कभी जम जाती हो .

कोलाहल है ,
चुप्पी भी है ,
देह की गंध सरीखे तेरे ,
जिन्दगी तुम बदली सी ,
कभी चढ़ जाती हो ,
कभी फिर जाती हो .

आना-जाना ,
लगा रहा है ,
जैसे पंछी के नित फेरे ,
जिन्दगी तुम सहेली सी ,
कभी तुम आती हो ,
कभी तुम जाती हो .

तुम को समझूं ,
इधर-उधर से ,
कई प्रश्न अनुत्तरित मेरे ,
जिन्दगी तुम पहेली सी ,
कभी दिख जाती हो,
कभी छिप जाती हो .

तुम अपनी भी ,
तुम  पराई भी  ,
जैसे आ कर अतिथि रहते,
जिन्दगी तुम दुहेली सी ,
कभी सुलझ जाती हो ,
कभी उलझ जाती हो .

1 comment:

  1. सुकोमल गीत जिन्दगी की परतें खोलता हुआ . कृपया अवश्य ही पढ़ें . अनुभव बताएं.


    ReplyDelete